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Vat Savitri Vrat 2023: आज बेहद शुभ संयोग में पड़ रहा वट सावित्री व्रत, जानें सामग्री व पूजन-विधि

इस साल वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) के दिन बेहद शुभ संयोग बन रहा है। चूंकि इस साल शनि जयंती भी इसी दिन पड़ रही है। इसके अलावा शनि के कुंभ राशि में होने से शश महापुरुष योग का निर्माण हो रहा है।

Vat Savitri Vrat 2023: आज ज्येष्ठ मास वट सावित्री का है। हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि के दिन वट सावित्री का व्रत रखा जाता है। अन्य के दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के साथ संतान के उत्तम भविष्य के लिए बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। साथ ही सावित्री देवी और मां पार्वती से सौभाग्य की कामना करती है।

इस साल वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) के दिन बेहद शुभ संयोग बन रहा है। चूंकि इस साल शनि जयंती भी इसी दिन पड़ रही है। इसके अलावा शनि के कुंभ राशि में होने से शश महापुरुष योग का निर्माण हो रहा है। साथ ही सिद्धि योग और गजकेसरी योग भी बन रहा है। इसके साथ-साथ शोभन योग शाम भी रहेगा।

इन शुभ योगों में पूजा करने से विशेष लाभ मिलेगा।जानिए अखंड सौभाग्य के इस व्रत का शुभ मुहूर्त, पूजा-विधि और सामग्री।

पूजा मुहूर्त
चर-सामान्य मुहूर्त सुबह 05 बजकर 28 मिनट से सुबह 07 बजकर 11 मिनट तक। लाभ-उन्नति मुहूर्त सुबह 07 बजकर 11 मिनट से सुबह 08 बजकर 53 मिनट।

अमृत सर्वोत्तम मुहूर्त- सुबह 08 बजकर 53 मिनट से सुबह 10 बजकर 35 मिनट तक। शुभ उत्तम मुहूर्त-दोपहर 12 बजकर 18 मिनट से 02 बजे तक है।

पूजन सामग्री
सावित्री और माता पार्वती की मूर्ति बनाने के लिए गाय का गोबर, कच्चा सूत या फिर सफेद धागा, बांस का पंखा,लाल कलावा, बरगद की एक कोपल, खरबूज, आम आदि फल-फूल, माला, बताशा, सिंदूर, रोली, इत्र, सुपारी, पान, लाल कपड़ा और अक्षत के लिए चावल।

सुहाग का सामान
नकद रुपए, पूड़ि‍यां, भिगोया हुआ चना, आटा और गुड़ से बने गुलगुले, स्टील या कांसे की थाली, मिठाई, धूप और मिट्टी या पीतल का दीपक और घी।

व्रत पूजा विधि
व्रत के दिन सूर्योदय से पहले सभी कामों ने निवृत्त होकर स्नान आदि कर लें। इसके बाद साफ वस्त्र धारण कर लें। ध्यान रखें कि कोई भी वस्त्र, काला, सफेद या फिर नीला रंग का न हो।

पूजा की पूरी तैयारी में सबसे पहले साफ पानी और आटा का इस्तेमाल करके गुलगुले, पूड़ी आदि बना लें। साथ ही चावल, हल्दी और पानी में उबटन की तरह बना लें। लाल, पीली या फिर हरी रंग की साड़ी, सूट आदि पहनने के बाद सोलह श्रृंगार अवश्य करें।

तत्पश्चात, बरगद के पेड़ के नीचे जाकर गाय के गोबर से सावित्री और माता पार्वती की मूर्ति बनाएं। अगर गाय का गोबर नहीं एक है, तो दो सुपारी में कलावा लपेटकर सावित्री और माता पार्वती की प्रतीक के रूप में रख लें। इसके बाद चावल वाले उबटन को हथेलियों में लगाकर सात बार बरगद में छापा लगाएं। अब वट वृक्ष में जल अर्पित करें और फिर फिर फूल, माला, सिंदूर, अक्षत, मिठाई, खरबूज, सेब आदि अन्य मिठाई और फल अर्पित कर दें। अब 14 पूड़ियों लेकर हर पूड़ी में 2 भिंगोय हुए चने और आटा-गुड़ के बने गुलगुले रख दें और इसे बरगद की जड़ में रख दें, फिर जल अर्पित कर दें।

इसके बाद घी का दीपक और धूप जला लें। इसके बाद सफेद सूत का धागा या फिर सफेद नार्मल धागा, कलावा आदि लेकर वृक्ष के चारों ओर परिक्रमा करते हुए बांध दें।

5 से 7 या फिर अपनी श्रद्धा के अनुसार परिक्रमा कर लें। इसके बाद बचा हुआ धागा वहीं पर छोड़ दें। अब व्रत कथा पढ़ें या फिर सुने। कथा श्रद्धापूर्वक सुनने के बाद वट वृक्ष में चने अर्पित कर लें।

कथा सुनने के बाद सुहागिन महिलाएं माता पार्वती और सावित्री के को चढ़ाए गए सिंदूर को तीन बार लेकर अपनी मांग में लगा लें। फिर विधिवत आरती करके भूल चूक के लिए माफी मांग लें। इसके बाद महिलाएं अपना व्रत खोल सकती हैं। व्रत खोलने के लिए बरगद के वृक्ष की एक कोपल और 7 चना लेकर पानी के साथ निगल लें। फिर प्रसाद के रूप में पूड़ियां, खरबूज आदि का सेवन करें।