विदेश

गाजा के ‘’Board of Peace’ का हिस्सा बनने के लिए भारत को ट्रम्प ने किया आमंत्रित

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को गाजा में शांति स्थापना और पुनर्निर्माण के लिए प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) में शामिल होने का औपचारिक निमंत्रण दिया है। यह निमंत्रण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधे भेजा गया है, और अमेरिका के भारत में राजदूत सर्जियो गोर ने इसे सोशल मीडिया पर साझा किया है।

ट्रंप ने इसे एक “ऐतिहासिक और भव्य प्रयास” बताया है, जिसमें बोर्ड गाजा में स्थिरता, प्रभावी शासन, पुनर्निर्माण, निवेश और मानवीय सहायता की निगरानी करेगा। यह ट्रंप की 20-सूत्रीय व्यापक शांति योजना का हिस्सा है, जो इजरायल-हमास संघर्ष के बाद के चरण (Phase Two) में लागू हो रही है। बोर्ड को एक नई अंतरराष्ट्रीय संस्था के रूप में देखा जा रहा है, जिसकी अध्यक्षता ट्रंप खुद करेंगे।

मुख्य बिंदु:

भारत को निमंत्रण क्यों?
भारत की संतुलित विदेश नीति, दोनों पक्षों (इजरायल और फिलिस्तीन) से अच्छे संबंध, और मानवीय सहायता (मिस्र के माध्यम से गाजा को राहत सामग्री) के कारण इसे दोनों पक्षों के लिए स्वीकार्य माना जा रहा है। भारत की वैश्विक साख और कूटनीतिक भूमिका को भी श्रेय दिया गया है।

अन्य देश
ट्रंप ने लगभग 60 देशों को निमंत्रण भेजा है, जिनमें पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, हंगरी, वियतनाम, जॉर्डन, साइप्रस आदि शामिल हैं। हंगरी और वियतनाम ने इसे स्वीकार कर लिया है, जबकि कई देश (जैसे ऑस्ट्रेलिया) चर्चा कर रहे हैं।

बोर्ड की संरचना:
मुख्य बोर्ड (ट्रंप की अध्यक्षता में)।

गाजा एग्जीक्यूटिव बोर्ड (क्षेत्रीय देशों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के साथ)।

फिलिस्तीनी तकनीकी समिति (National Committee for the Administration of Gaza) गवर्नेंस संभालेगी।

विश्व बैंक अध्यक्ष अजय बंगा (भारतीय मूल), टोनी ब्लेयर, जेरेड कुशनर जैसे नाम भी जुड़े हैं।

विवादास्पद पहलू: कुछ रिपोर्ट्स (जैसे ब्लूमबर्ग) में दावा है कि स्थायी सदस्यता के लिए $1 बिलियन का योगदान चाहिए, लेकिन व्हाइट हाउस ने इसे भ्रामक बताया है। इजरायल ने कुछ देशों (जैसे पाकिस्तान) पर आपत्ति जताई है। कई विश्लेषक इसे UN सिक्योरिटी काउंसिल का “समांतर” प्रयास मान रहे हैं।

भारत ने अभी तक आधिकारिक तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है—यह एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक फैसला होगा, जिसमें जोखिम और अवसर दोनों हैं। यदि भारत शामिल होता है, तो यह मध्य पूर्व में उसकी भूमिका को और मजबूत कर सकता है।

(एजेंसी इनपुट के साथ)