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वर्कप्लेस पर बढ़ता तनाव: कॉरपोरेट सेक्टर में मानसिक स्वास्थ्य अब बड़ी चिंता

नोएडा: भारत के कॉरपोरेट जगत में कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य और कार्यस्थल पर उनके समग्र कल्याण को लेकर चर्चा धीरे-धीरे गति पकड़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियों को अब केवल उत्पादकता और लक्ष्यों तक सीमित सोच से आगे बढ़कर कर्मचारियों के भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य को भी गंभीरता से लेना होगा।

इसी दिशा में जीवन कौच और वर्कप्लेस वेल-बीइंग स्पीकर कोच वीना ने हाल ही में नोएडा स्थित इनोवा सॉल्यूशंस के कर्मचारियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य और तनाव प्रबंधन पर दो इंटरैक्टिव सत्र आयोजित किए। कर्मचारियों की कार्य-व्यस्तता को ध्यान में रखते हुए ये सत्र दो अलग-अलग शिफ्टों में आयोजित किए गए, ताकि अधिक से अधिक लोग इसमें भाग ले सकें।

इन सत्रों का मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों को कार्यस्थल के तनाव से निपटने के व्यावहारिक तरीके सिखाना, भावनात्मक मजबूती विकसित करना और मानसिक संतुलन बनाए रखने के उपायों पर चर्चा करना था। व्यस्त कार्यशैली के बावजूद कर्मचारियों ने इन सत्रों में सक्रिय भागीदारी दिखाई और करियर से जुड़ा दबाव, पारिवारिक अपेक्षाएं तथा काम और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाए रखने जैसी चुनौतियों पर खुलकर सवाल उठाए।

कोच वीना के अनुसार, कर्मचारियों की उत्साही भागीदारी इस बात का संकेत है कि कॉरपोरेट माहौल में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बातचीत की जरूरत पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

उन्होंने कहा, “अधिकांश संगठन लक्ष्य, समय-सीमा और मुनाफे पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं, लेकिन कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य में निवेश करने पर उतना जोर नहीं दिया जाता। इसलिए यह देखना सकारात्मक था कि कर्मचारी इतनी खुलकर अपनी बात रख रहे थे।”

सत्र के दौरान आज के पेशेवर जीवन से जुड़े कई सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर भी चर्चा हुई, जिनमें खासतौर पर युवा पेशेवरों और कामकाजी महिलाओं से जुड़ी चुनौतियां शामिल थीं।

चर्चा के दौरान एक महत्वपूर्ण विषय आधुनिक परिवारों में महिलाओं के करियर विकल्पों का भी सामने आया। कोच वीना ने महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता और पेशेवर पहचान बनाए रखने के लिए अपने करियर को जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया। हालांकि कुछ प्रतिभागियों ने यह भी बताया कि कई महिलाएं विवाह के बाद स्वेच्छा से नौकरी छोड़कर पति की आय पर आधारित आरामदायक जीवन को प्राथमिकता देती हैं।

यह चर्चा आगे बढ़ते हुए पहचान, स्वतंत्रता और दीर्घकालिक मानसिक संतुलन जैसे व्यापक मुद्दों तक पहुंच गई।

कई प्रतिभागियों का मानना था कि नौकरी छोड़ना शुरू में आरामदायक लग सकता है, लेकिन समय के साथ कुछ लोगों को अपनी व्यक्तिगत पहचान खोने या आर्थिक रूप से निर्भर होने का एहसास होने लगता है।

कोच वीना ने कहा, “कई कर्मचारियों ने साझा किया कि समय के साथ आर्थिक निर्भरता असहजता पैदा कर सकती है, खासकर तब जब खर्चों को लेकर सवाल उठने लगें या व्यक्ति को लगे कि उसकी स्वतंत्रता सीमित हो गई है।”

सत्र के दौरान एक और अहम मुद्दा उभरकर सामने आया—कार्यस्थल में प्रवेश कर रही जेनरेशन ज़ेड की मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियां।

कई युवा कर्मचारियों ने बताया कि उनकी चिंता और तनाव की जड़ें अक्सर उनके बचपन और किशोरावस्था में पड़े दबावों से जुड़ी होती हैं। माता-पिता की अपेक्षाएं, शिक्षा में तीव्र प्रतिस्पर्धा और समाज में लगातार तुलना जैसे कारक उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।

कुछ प्रतिभागियों ने यह भी कहा कि कई बार माता-पिता अनजाने में अपनी अधूरी आकांक्षाएं और चिंताएं बच्चों पर थोप देते हैं, जो आगे चलकर वयस्क जीवन में मानसिक दबाव का कारण बनती हैं।

इन चिंताओं को स्वीकार करते हुए कोच वीना ने परिवार और कार्यस्थल दोनों जगह भावनात्मक समझ और संवेदनशीलता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने कहा, “जेनरेशन ज़ेड मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों पर पहले की पीढ़ियों की तुलना में अधिक खुलकर बात करती है। उनकी चिंताओं को नजरअंदाज करने के बजाय उनके कारणों को समझना और उन्हें स्वस्थ तरीके से उनसे निपटने में मदद करना जरूरी है।”

कार्यशाला के दौरान कोच वीना ने कर्मचारियों को कुछ सोमैटिक तकनीकों से भी परिचित कराया। ये शरीर आधारित अभ्यास होते हैं जो तनाव को नियंत्रित करने और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं। इन तकनीकों में सांस लेने के अभ्यास, ग्राउंडिंग और माइंडफुलनेस जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं, जो तनाव के समय तंत्रिका तंत्र को शांत करने में सहायक होती हैं।

इसके अलावा सत्र में सकारात्मक और नकारात्मक कोपिंग मैकेनिज्म के बीच अंतर पर भी चर्चा हुई।

कोच वीना ने कहा कि तनाव पेशेवर जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन उससे निपटने का तरीका ही यह तय करता है कि उसका मानसिक स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव कैसा होगा।

उन्होंने अत्यधिक खाना, भावनात्मक कारणों से बार-बार ऑनलाइन खरीदारी करना—जिसे “ट्रॉमा शॉपिंग” कहा जाता है—और शराब का सहारा लेना जैसी आदतों से बचने की सलाह दी।

उन्होंने कहा, “ऐसी आदतें थोड़े समय के लिए राहत दे सकती हैं, लेकिन वे मूल समस्या का समाधान नहीं करतीं और कई बार तनाव को और बढ़ा देती हैं।”

इसके स्थान पर उन्होंने कर्मचारियों को नियमित शारीरिक गतिविधि, सजग श्वास अभ्यास, खुला संवाद और निजी व पेशेवर जीवन में स्पष्ट सीमाएं तय करने जैसी स्वस्थ आदतें अपनाने के लिए प्रेरित किया।

कॉरपोरेट मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे कार्यस्थल का वातावरण बदल रहा है और नई पीढ़ी कार्यबल में शामिल हो रही है, वैसे-वैसे कर्मचारी कल्याण से जुड़ी पहलें और अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही हैं।

इनोवा सॉल्यूशंस में आयोजित इन सत्रों का समन्वय शिल्पा राजपूत ने किया, जिन्होंने इसे संगठन की कर्मचारी सहभागिता पहल के तहत संभव बनाया।

कोच वीना ने कहा कि इस अनुभव ने यह साबित किया कि कार्यस्थलों पर ऐसे सुरक्षित वातावरण की आवश्यकता है, जहां कर्मचारी बिना झिझक अपने तनाव, भावनात्मक चुनौतियों और व्यक्तिगत विकास से जुड़े मुद्दों पर बात कर सकें।

उन्होंने कहा, “जब संगठन कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हैं, तो इससे न केवल कार्यस्थल का माहौल बेहतर होता है बल्कि कर्मचारियों की उत्पादकता और संतुष्टि भी बढ़ती है।”

वैश्विक स्तर पर बढ़ते कॉरपोरेट बर्नआउट के बीच विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में काउंसलिंग, मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और वेल-बीइंग वर्कशॉप जैसी पहलें किसी भी संगठन की संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा बन सकती हैं।

कोच वीना ने उम्मीद जताई कि भविष्य में और अधिक कंपनियां कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य में निवेश के महत्व को समझेंगी और ऐसे कार्यक्रमों को बढ़ावा देंगी।