ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (Green Hydrogen Mission) को रफ्तार देते हुए हाल ही में भारत सरकार ने 400 करोड़ रुपये की लागत वाला एक आर एण्ड डी (अनुसंधान एवं विकास) रोडमैप पेश किया है।
यूरोप के तमाम विकसित देश अक्सर भारत जैसे विकासशील देशों पर अधिक कार्बन एमिशन (carbon emission) का आरोप लगाते हैं और उम्मीद करते हैं कि वो अपना एमिशन सतत गति से कम करें और एनेर्जी ट्रांज़िशन (energy transition) की सोचें, लेकिन आज हालात ऐसे बन गए हैं कि यूरोप ख़ुद एक ऊर्जा संकट (energy crisis) की मझधार में फंसा दिख रहा है।
जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से गंभीर प्रभावों से बचने के लिए दुनिया को कोयले के जलने से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करने के लिए तेजी से आगे आना चाहिए। ऐसा कुछ करने के लिए ज़रूरी है कि कोयले के स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों के लिए बड़े पैमाने पर वित्तपोषण को तेजी से बढ़ाया जाए और तत्काल नीति कार्रवाई सुनिश्चित कि जाए।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) की जर्मनी (Germany) में हुए जी-7 (G7) सम्मेलन में मौजूदगी ने जहां एक ओर दुनिया के पटल पर भारत की प्रासंगिकता को एक बार फिर साबित किया, वहीं प्रधानमंत्री ने इस वैश्विक मंच का भरपूर फायदा उठाते हुए दुनिया को न सिर्फ़ शांति का संदेश दिया बल्कि यह भी साफ़ किया कि जलवायु गुणवत्ता (climate quality) के प्रति भारत का निश्चय उसके प्रदर्शन से साफ़ झलकता है और दुनिया को उससे सीखना चाहिए।
