एक बार लक्ष्मीजी (Laxmiji) , पार्वतीजी (Parvatiji) और सरस्वतीजी (Saraswatiji) को अपने पातिव्रत्य पर गर्व हो गया। भगवान को गर्व सहन नहीं होता है। उन्होंने इन तीनों के गर्वहरण के लिए एक लीला करने की सोची । इस कार्य के लिए उन्होंने नारदजी के मन में प्रेरणा उत्पन्न की।

