H-1B Visa News: ट्रंप की $100,000 फीस योजना रद्द, भारतीय पेशेवरों को बड़ी राहत

H-1B Visa News: अमेरिका में H-1B वीज़ा को लेकर ट्रंप प्रशासन को बड़ा झटका लगा है। सोमवार को एक अमेरिकी फ़ेडरल जज ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस योजना पर रोक लगा दी, जिसके तहत H-1B वीज़ा कार्यक्रम के माध्यम से विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने वाले नियोक्ताओं से 1 लाख डॉलर की अतिरिक्त फीस वसूलने का प्रस्ताव था।

अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट जज रिचर्ड स्टर्न्स ने अपने फैसले में कहा कि सितंबर 2025 में जारी यह आदेश संविधान में निहित ‘शक्तियों के पृथक्करण’ (Separation of Powers) के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह के वित्तीय प्रावधान लागू करने का अधिकार केवल कांग्रेस के पास है, न कि राष्ट्रपति के प्रशासन के पास।

इस फैसले को H-1B वीज़ा धारकों और विशेष रूप से भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, क्योंकि प्रस्तावित फीस से अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करना काफी महंगा हो सकता था।

स्टर्न्स का यह फ़ैसला वॉशिंगटन, DC में एक फ़ेडरल जज द्वारा US चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के एक ऐसे ही मुक़दमे में ट्रंप प्रशासन का समर्थन करने के छह महीने बाद आया है। उस जज ने फ़ैसला सुनाया था कि कांग्रेस ने राष्ट्रपति को विदेशी कर्मचारियों को काम पर रखने वाले एम्प्लॉयर्स पर प्रस्तावित $100,000 की फ़ीस लगाने का अधिकार दिया था।

क्या है H-1B वीज़ा?
H-1B वीज़ा प्रोग्राम एम्प्लॉयर्स को ऐसे खास कामों में अस्थायी तौर पर विदेशी कर्मचारियों को रखने के लिए आवेदन करने की अनुमति देता है, जिनके लिए कम से कम बैचलर डिग्री की ज़रूरत होती है।

कैलिफ़ोर्निया राज्य के न्याय विभाग के अनुसार, H-1B कर्मचारी के लिए आवेदन करते समय, एम्प्लॉयर को US श्रम विभाग द्वारा प्रमाणित एक आवेदन जमा करना होता है। इसमें यह बताना होता है कि H-1B कर्मचारी को काम पर रखने से उसी तरह के काम में लगे अमेरिकी कर्मचारियों की सैलरी और काम की स्थितियों पर बुरा असर नहीं पड़ेगा।

अमेरिकी कांग्रेस ज़्यादातर प्राइवेट एम्प्लॉयर्स के लिए हर साल उपलब्ध H-1B वीज़ा की संख्या सीमित करती है। अभी यह सीमा 65,000 है, जिसमें मास्टर डिग्री या उससे ज़्यादा डिग्री वाले लोगों के लिए 20,000 की छूट है।

सितंबर 2025 में, ट्रंप ने नए H-1B वीज़ा आवेदनों पर $100,000 की फ़ीस लगाने का आदेश जारी किया था।

सितंबर 2025 के आदेश में क्या कहा गया था?
ट्रंप और उनके सहयोगियों का तर्क था कि इस प्रोग्राम का गलत इस्तेमाल करके कम सैलरी पर विदेशी कर्मचारियों को काम पर रखा जाता है, जिससे अमेरिकी कर्मचारियों को नज़रअंदाज़ किया जाता है या उनकी नौकरी चली जाती है।

ट्रंप ने अपने आदेश में कहा, “H-1B प्रोग्राम का गलत इस्तेमाल राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करता है क्योंकि यह अमेरिकियों को विज्ञान और टेक्नोलॉजी में करियर बनाने से हतोत्साहित करता है, जिससे इन क्षेत्रों में अमेरिकी नेतृत्व को खतरा होता है।”

राहत की सांस, लेकिन क्या मामला सच में खत्म
इंडिआस्पोरा (Indiaspora) के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर संजीव जोशीपुरा ने PTI से कहा, “कोर्ट के आदेश के बाद H-1B वीज़ा से जुड़े सभी स्टेकहोल्डर्स राहत की सांस लेंगे, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह मामला सच में खत्म हो गया है।”

हालांकि, उन्होंने सावधानी बरतने की बात भी कही। उन्होंने कहा कि अमेरिकी प्रशासन अभी भी H-1B वीज़ा होल्डर्स के लिए ऐसी प्रक्रियात्मक (procedural) अड़चनें पैदा कर सकता है जो कानून के दायरे में हों और जिनका कानूनी तौर पर विरोध न किया जा सके।

प्रशासन और न्यायपालिका के बीच हालिया खींचतान का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, “अगर प्रशासन अपनी तय नीतियों के मुताबिक H-1B वीज़ा होल्डर्स के लिए रुकावटें पैदा करना चाहता है, तो वे ऐसा प्रक्रियात्मक तरीकों से कर सकते हैं जो अमेरिकी कानून का उल्लंघन न करते हों।”

भारतीयों के लिए इसका क्या मतलब?
जारी किए गए सभी H-1B वीज़ा में से ज़्यादातर (लगभग 70-72%) भारतीय नागरिकों को मिलते हैं। टेक्नोलॉजी कंपनियाँ हर साल भारत और चीन जैसे देशों से हज़ारों कर्मचारियों को हायर करने के लिए इन पर निर्भर रहती हैं। इसलिए, यह फैसला भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए बहुत अहम है।

प्रस्तावित $100,000 की फीस से H-1B के ज़रिए हायरिंग बहुत महंगी हो सकती थी, जिससे कई एम्प्लॉयर्स विदेशी प्रोफेशनल्स को स्पॉन्सर करने में कटौती कर सकते थे या इस पर दोबारा सोच सकते थे।

यह फैसला एम्प्लॉयर्स और H-1B वीज़ा चाहने वाले भारतीय प्रोफेशनल्स – जैसे इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर, रिसर्चर, डॉक्टर और दूसरे स्किल्ड वर्कर्स – दोनों के लिए राहत लेकर आया है।

(एजेंसी इनपुट के साथ)