हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, शैलपुत्री पहाड़ों के राजा हिमालय की बेटी हैं, और उन्हें शक्ति के रूप में जानी जाने वाली दिव्य ऊर्जा का अवतार माना जाता है। उन्हें भगवान शिव की पहली पत्नी सती का अवतार भी माना जाता है। शैलपुत्री को शक्ति और दृढ़ संकल्प के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है।
विश्व का सबसे बड़ा यह मंदिर कंबोडिया (Cambodia) में है। इसे अंकोरवाट (Angkor Wat) के नाम जाना जाता है। यह मंदिर अंकोरयोम नामक नगर में स्थित है, जिसे प्राचीन काल में यशोधरपुर कहा जाता था। यह विशाल भव्य मंदिर भगवान विष्णु (Lord Vishnu) को समर्पित है
छोटे से लेकर बडों तक सभी को समीप के प्रतीत होनेवाले भगवान अर्थात ‘पवनपुत्र’! पवनपुत्र का अन्य सर्वपरिचित नाम है...
पटन देवी भी दो हैं- छोटी पटन देवी और बड़ी पटन देवी, दोनों के अलग-अलग मंदिर हैं। पटना की नगर रक्षिका भगवती पटनेश्वरी (Pataneshwari) हैं जो छोटी पटन देवी के नाम से भी जानी जाती हैं। यहां मंदिर परिसर में मां महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की स्वर्णाभूषणों, छत्र व चंवर के साथ विद्यमान हैं। लोग प्रत्येक मांगलिक कार्य के बाद यहां जरूर आते हैं। इस मंदिर के पीछे एक बहुत बड़ा गड्ढा है, जिसे ‘पटनदेवी खंदा’ कहा जाता है।
तमिलनाडु के तंजावुर शहर में स्थित भगवान शिव का प्रसिद्ध बृहदेश्वर मंदिर (Brihadeeswarar Temple) है। एक हजार वर्ष पुराने बृहदेश्वर मंदिर को UNESCO World Heritage Site लिस्ट में विश्व धरोहर घोषित किया है। यह दुनिया में पहला और एकमात्र ऐसा मंदिर है जो पूरी तरह ग्रेनाइट पत्थरों से बना हुआ है।
अनमोल कुमार शिवजी के अनन्य भक्त मृकण्ड ऋषि संतानहीन होने के कारण दुखी थे। विधाता ने उन्हें संतान योग नहीं...
ऐसे करेंगे पूजन तो कालसर्प संबंधी दोष से मिलेगी मुक्ति
राधा जी की भगवान श्रीकृष्ण जी पर अपार भक्ती थी। परंतु आज के काल में अनेक कथा वाचक श्रीकृष्ण और...
तमिलनाडु के पेरावोरानी के पास तंजावूर के विलनकुलम में अक्षयपुरीश्वर मंदिर (Akshayapureeswarar Temple) है। ये मंदिर भगवान शनि के पैर टूटने की घटना से जुड़ा हुआ है। इस मंदिर में शारीरिक रुप से परेशान और साढ़े साती में पैदा हुए लोग शनिदेव की विशेष पूजा के लिए आते हैं।
त्रेतायुग में श्रीविष्णु के सातवें अवतार श्री रामजी ने पुष्य नक्षत्रपर, मध्याह्न काल में अयोध्या में जन्म लिया। वह दिन...
यह विश्व का ऐसा अनोखा मंदिर है, जो 24 घंटे में मात्र दो मिनट के लिए बंद होता है। यहां तक कि ग्रहण काल में भी मंदिर बंद नहीं किया जाता है। कारण यह कि यहां विराजमान भगवान कृष्ण को हमेशा तीव्र भूख लगती है। भोग नहीं लगाया जाए तो उनका शरीर सूख जाता है। अतः उन्हें हमेशा भोग लगाया जाता है, ताकि उन्हें निरंतर भोजन मिलता रहे।
दशहरा (Dussehra) केवल त्योहार ही नहीं, बल्कि इसे कई बातों का प्रतीक भी माना जाता है। इस त्योहार के साथ कई धार्मिक मान्यताएँ व कहानियाँ भी जुड़ी हुई है। आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दशहरा या विजयदशमी (Vijayadashami) के रूप में मनाया जाता है जो हिन्दू धर्म के बड़े त्योहारों में से एक है।


