US Student Visa Rule: अमेरिका में पढ़ाई करने वाले विदेशी छात्रों के लिए ट्रंप प्रशासन के नए वीजा नियम पर फिलहाल रोक लगा दी गई है। अमेरिकी फेडरल जज एफ. डेनिस सेलॉर IV ने उस नियम के लागू होने पर अस्थायी रोक लगाई है, जिसमें लंबे समय से चले आ रहे “Duration of Status” (D/S) सिस्टम को खत्म कर विदेशी छात्रों के लिए तय अवधि में अमेरिका में रहने की व्यवस्था की गई थी।
नया नियम 15 सितंबर 2026 से लागू होने वाला था। इसके तहत ज्यादातर F-1 छात्रों को एक निश्चित अवधि के लिए अमेरिका में रहने की अनुमति मिलती, जिसमें सामान्य तौर पर अधिकतम चार साल तक की अवधि शामिल थी। जरूरत पड़ने पर छात्रों को अतिरिक्त समय के लिए अलग से एक्सटेंशन लेना पड़ता।
कोर्ट ने क्यों लगाई रोक?
मैसाचुसेट्स के यूएस डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज सेलॉर ने माना कि डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने इस बदलाव को लागू करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं दिया। अदालत ने यह भी कहा कि नियम से अमेरिकी उच्च शिक्षा व्यवस्था और अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है।
कोर्ट का आदेश देशभर में लागू है। हालांकि, जज ने नए नियम को स्थायी रूप से रद्द नहीं किया है। इसका मतलब है कि आगे की कानूनी प्रक्रिया के दौरान इस मामले में बदलाव संभव है।
भारतीय छात्रों के लिए क्या मतलब?
फिलहाल अमेरिका में पढ़ रहे भारतीय छात्रों समेत अन्य अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए पुराना Duration of Status सिस्टम जारी रहेगा। यानी जो छात्र अपने F-1 स्टेटस और संबंधित शर्तों का पालन कर रहे हैं, उन्हें नए चार साल वाले फिक्स्ड-स्टे सिस्टम के तहत तुरंत एक्सटेंशन लेने की जरूरत नहीं है।
इससे खासतौर पर लंबे कोर्स, रिसर्च और PhD जैसे प्रोग्राम में पढ़ने वाले छात्रों को फिलहाल राहत मिलती है, क्योंकि ऐसे कार्यक्रमों को चार साल से ज्यादा समय लग सकता है। नए नियम में निर्धारित अवधि से अधिक समय की जरूरत होने पर एक्सटेंशन की प्रक्रिया अपनानी पड़ती।
क्या नियम पूरी तरह खत्म हो गया है?
नहीं। कोर्ट ने फिलहाल नियम के लागू होने पर अस्थायी रोक लगाई है। अंतिम कानूनी फैसला अभी बाकी है। इसलिए भारतीय छात्रों और अमेरिका जाने की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए आगे DHS, USCIS और अदालत की अगली कार्रवाई पर नजर रखना जरूरी होगा।
ट्रंप का 4 साल का स्टूडेंट वीज़ा नियम क्या था?
मौजूदा सिस्टम के तहत, विदेशी छात्र आम तौर पर अपने एकेडमिक प्रोग्राम की अवधि तक अमेरिका में रह सकते हैं, बशर्ते वे अपना अधिकृत स्टेटस बनाए रखें।
नए सिस्टम में F-1 और J-1 एडमिशन को आम तौर पर प्रोग्राम की अवधि तक सीमित कर दिया जाता, जिसकी अधिकतम सीमा चार साल होती।
जिन छात्रों को ज़्यादा समय की ज़रूरत होती, उन्हें US सिटिज़नशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज़ (USCIS) के ज़रिए समय बढ़ाने (एक्सटेंशन) के लिए आवेदन करना पड़ता और मंज़ूरी सरकारी अधिकारियों पर निर्भर करती।
इस नियम में पढ़ाई के बाद 30 दिन का ग्रेस पीरियड भी शामिल था (जो पहले 60 दिन था), और इसमें मेजर बदलने, दूसरे संस्थान में जाने और नए प्रोग्राम शुरू करने पर अतिरिक्त पाबंदियां लगाई गई थीं।
जज ने इस नियम पर रोक क्यों लगाई?
जज सेलॉर ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और बॉर्डर-कंट्रोल की चिंताओं का हवाला देने के बावजूद DHS के लिए ‘एडमिनिस्ट्रेटिव प्रोसीजर एक्ट’ का पालन करना ज़रूरी था।
जज ने पाया कि वादी (मुकदमा करने वाले) इस नियम को चुनौती देने में सफल हो सकते हैं और इसे लागू करने से तुरंत और कभी न ठीक होने वाला नुकसान हो सकता है।
सेलॉर ने लिखा, “अमेरिका के हायर-एजुकेशन सिस्टम और अर्थव्यवस्था को होने वाला नुकसान बहुत ज़्यादा हो सकता है।”
उन्होंने सरकार की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि कोई भी रोक (इंजंक्शन) सिर्फ़ उन संगठनों पर लागू होनी चाहिए जिन्होंने यह केस किया है।
वादी लगभग 600 सरकारी और प्राइवेट संस्थानों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि पूरे अमेरिका में 5,000 से ज़्यादा हायर-एजुकेशन संस्थान काम करते हैं। सेलॉर ने कहा कि राहत को सीमित करने से समानांतर रेगुलेटरी सिस्टम बन सकते हैं और फ़ैसलों में विसंगतियां हो सकती हैं।
भारतीय छात्रों के लिए इस फ़ैसले का क्या मतलब है? भारतीय छात्रों के लिए, कानूनी चुनौती जारी रहने के बावजूद, इसका तुरंत असर यह है कि उन्हें चार साल की समय-सीमा और उससे जुड़ी तय अवधि वाले एडमिशन की शर्तों से राहत मिली है।
जो छात्र पहले से ही अमेरिका में हैं, वे अभी के लिए मौजूदा नियमों के तहत ही अपनी पढ़ाई जारी रख सकते हैं; उन्हें तुरंत नए एक्सटेंशन सिस्टम में नहीं डाला जाएगा।
यह बात उन भारतीय छात्रों के लिए खास तौर पर अहम है जो लंबे एकेडमिक प्रोग्राम, जैसे डॉक्टरेट और रिसर्च कोर्स कर रहे हैं। हार्वर्ड के प्रेसिडेंट एलन गारबर ने पहले चार साल की सीमा पर सवाल उठाए थे और कहा था कि आम तौर पर PhD करने में कम से कम छह साल लग सकते हैं।
इस फैसले का मतलब यह भी है कि छात्रों पर प्रोग्राम बदलने, संस्थान बदलने या दूसरी डिग्री लेने से जुड़ी प्रस्तावित अतिरिक्त पाबंदियां तुरंत लागू नहीं होंगी।
भारत के लिए यह फैसला क्यों अहम है?
अमेरिका में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों में भारत के छात्रों की संख्या सबसे ज़्यादा है।
केस से जुड़ी जानकारी में ‘ओपन डोर्स 2025’ रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। इसके मुताबिक, 2024-25 एकेडमिक ईयर में अमेरिका के कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज़ में 3,63,019 भारतीय छात्र एनरोल्ड थे, जो देश में सभी विदेशी छात्रों का लगभग 31% हिस्सा है।
इस वजह से, अमेरिका के स्टूडेंट-वीज़ा सिस्टम में कोई भी बदलाव भारतीय छात्रों, यूनिवर्सिटीज़ और अमेरिका में हायर एजुकेशन लेने के बारे में सोच रहे परिवारों के लिए बहुत अहम हो जाता है।
यह नियम उन छात्रों के लिए और ज़्यादा अनिश्चितता पैदा कर सकता था जिनके कोर्स चार साल से ज़्यादा समय के हैं, खासकर डॉक्टरेट, रिसर्च और दूसरे लंबे प्रोग्राम वाले छात्रों के लिए।
जिन छात्रों को चार साल से ज़्यादा समय चाहिए, उनका क्या होगा?
जिस नियम पर रोक लगाई गई है, उसके तहत जिन छात्रों को ज़्यादा समय चाहिए होता, उन्हें USCIS के पास ‘एक्सटेंशन ऑफ़ स्टे’ (रहने की अवधि बढ़ाने) के लिए औपचारिक एप्लीकेशन देनी पड़ती।
इस फैसले से नया सिस्टम अभी लागू नहीं हो पाएगा।
हालांकि, जज का यह फैसला एक शुरुआती रोक (प्रिलिमिनरी इंजेक्शन) है, न कि कोई अंतिम फैसला कि क्या DHS आखिरकार फिक्स्ड-टर्म वीज़ा सिस्टम लागू कर सकता है या नहीं।
कानूनी चुनौती जारी रहेगी, इसलिए विदेशी छात्रों से जुड़े नियम अंतिम नतीजे के आधार पर फिर से बदल सकते हैं।
अमेरिका से बाहर यात्रा करने वाले छात्रों का क्या?
प्रस्तावित नियम में उन छात्रों के लिए भी प्रावधान थे जो अमेरिका छोड़कर गए और बाद में वापस आना चाहते थे।
नियम लागू होने के बाद देश से बाहर यात्रा करने वाले छात्रों पर नई फिक्स्ड-डेट एडमिशन सिस्टम लागू हो सकता था।
चूंकि इसे लागू करने में अब देरी हो गई है, इसलिए जब तक रोक लगी हुई है, तब तक वे प्रावधान लागू नहीं होंगे।
नियम पत्रकारों पर भी लागू होता था, DHS का नियम सिर्फ़ छात्रों तक सीमित नहीं था।
‘I’ वीज़ा वाले विदेशी पत्रकारों को 240 दिन की एडमिशन लिमिट का सामना करना पड़ता, जबकि चीनी मीडिया प्रतिनिधियों पर 90 दिन की लिमिट लागू होती। जज सेलर ने इस बात पर चिंता जताई कि इस नियम का इस्तेमाल सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों, खासकर DHS अधिकारियों के खिलाफ किया जा सकता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इस पॉलिसी का असली मकसद राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा सुरक्षा से आगे बढ़कर एकेडमिक संस्थानों और प्रेस पर सरकार का ज़्यादा कंट्रोल करना हो सकता है।
DHS ने क्या कहा?
DHS ने तर्क दिया था कि फिक्स्ड-टर्म सिस्टम धोखाधड़ी से निपटने में मदद करेगा और सरकार के लिए वीज़ा की अवधि खत्म होने के बाद भी देश में रहने वालों की पहचान करना और उन पर कार्रवाई करना आसान बना देगा।
विभाग ने यह भी कहा कि मौजूदा ‘ड्यूरेशन-ऑफ-स्टेटस’ सिस्टम की वजह से कुछ विदेशी छात्र, एक्सचेंज विज़िटर और मीडिया प्रतिनिधि बिना पर्याप्त सरकारी निगरानी के US में रह पा रहे थे।
हालांकि, जज ने पाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा नियंत्रण के दावों के बावजूद DHS ‘एडमिनिस्ट्रेटिव प्रोसीजर एक्ट’ के तहत अपनी ज़िम्मेदारियों से बच नहीं सकता।
अब US जाने के लिए अप्लाई करने वाले भारतीय छात्रों का क्या होगा?
US जाने के इच्छुक भारतीय छात्रों के लिए, इस फैसले से अनिश्चितता की एक तात्कालिक वजह तो खत्म हो गई है, लेकिन प्रस्तावित चार साल की समय-सीमा पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है।
कानूनी लड़ाई अभी भी जारी है, जिसका मतलब है कि छात्रों और यूनिवर्सिटीज़ को कोर्ट के आगे के फैसलों और DHS की अगली कार्रवाई पर नज़र रखनी होगी।
(एजेंसी इनपुट के साथ)

