इस साल के अंत तक भारत ने अपने लिए 175 गीगावाट की रिन्यूबल एनेर्जी क्षमता स्थापना का लक्ष्य रखा था। मगर बीती अगस्त तक भारत ने इस लक्ष्य का दो तिहाई हासिल किया है। मतलब दिसंबर तक लक्ष्य का एक तिहाई हासिल करना बाकी है।
मिस्र के शर्म-अल-शेख में आगामी नवम्बर में आयोजित होने जा रहे संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (सीओपी27) से पहले विशेषज्ञों ने क्लाइमेट जस्टिस पर खास जोर देते हुए कहा है कि अगर इस पहलू पर ठोस कार्रवाई नहीं होती है तो सीओपी जैसे तमाम मंच बेमानी माने जाएंगे।
जब ग्लासगो में प्रधानमंत्री मोदी ने COP 26 के दौरान जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के खिलाफ़ वैश्विक जंग के संदर्भ में अंग्रेज़ी के शब्द LIFE के अक्षरों में छिपे एक मंत्र ‘लाइफ़स्टाइल फॉर एनवायरनमेंट’ (Lifestyle for Environment) का उल्लेख किया था, तब वो महज़ उनके चिर-परिचित अंदाज़ वाला शब्दों का खेल नहीं था।
रिन्यूबल एनर्जी (renewable energy) नामक पत्रिका में हाल ही में प्रकाशित एक लेख से इस बात की प्रबल संभावना जाहिर हुई है कि दिल्ली वर्ष 2050 तक जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) से छुटकारा पाकर 100% अक्षय ऊर्जा पर निर्भरता का लक्ष्य हासिल कर सकती है। अपनी तरह के इस पहले शोध में दिल्ली जैसे उत्तर भारतीय महानगर में 100% अक्षय ऊर्जा प्रणालियों की तकनीकी साध्यता और आर्थिक व्यवहार्यता के बारे में बात की गई है।
पवन और सौर उत्पादन में वृद्धि 2022 की पहली छमाही में मांग वृद्धि के तीन-चौथाई से अधिक हो गई, जबकि बाकी मांग हाइड्रो से पूरी हुई। ऐसा होने से न सिर्फ जीवाश्म उत्पादन में संभावित 4% की वृद्धि रोकी जा सकी, बल्कि ईंधन लागत में $ 40 बिलियन अमरीकी डालर और 230 मीट्रिक टन CO2 एमिशन को रोका गया।
हालांकि देश की परिवहन प्रणाली तेज़ गति से विकास कर रही है, मगर उसी अनुपात में परिवहन से होने वाले कार्बन उत्सर्जन की मात्रा में भी बढ़त हो रही है। ध्यान रहे कि भारत में होने वाले कुल कार्बन उत्सर्जन में परिवहन या ट्रांसपोर्ट सेक्टर का योगदान लगभग 14 प्रतिशत है। और इसमें से 90 प्रतिशत उत्सर्जन अकेले सड़क परिवहन से होता है।
दुनिया के पांच महाद्वीपों के 10 में 8 बड़े बिजनेस लीडर्स का मानना है कि ‘नेट जीरो’ के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने और अर्थव्यवस्था को व्यापक तौर पर कार्बनमुक्त बनाने के लिए सशक्त नियमों की जरूरत है। यह निष्कर्ष हाल में ही किए गए एक सर्वे से निकलते हैं।
महामारी के बाद इस क्षेत्र में भारत ने वापसी की, मगर महिलाओं की भागीदारी अब तक के सबसे निचले स्तर पर
साल का वो समय आ चुका है जब धान की कटाई और पराली जलाने का मौसम शुरू हो रहा है। और ऐसा होने के साथ ही दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में वायु प्रदूषण पर बहस फिर से जोर पकड़ रही है। मगर इस बार जो बात हमेशा से अलग है और जिसके चलते इन क्षेत्रों के प्रभावित नागरिकों को उम्मीद की किरण दिख रही है वो यह है कि इस बार राज्य सरकारों में दोषी कौन पर बहस के बजाय कुछ असल कार्यवाई होने की ऊमीद है।
ऑस्कर विजेता निर्माताओं द्वारा बनाई यह फीचर फिल्म पोप फ्रांसिस की व्यक्तिगत कहानी की न सिर्फ एक अनदेखी झलक पेश करती है बल्कि वैश्विक जलवायु न्याय के लिए दबाव भी बनाती है
भारत में लगातार चौथे वर्ष सामान्य से अधिक वर्षा दर्ज की गई। इस अधिक बारिश के लगातार तीसरे वर्ष होने के लिए लिए प्रशांत महासागर में सक्रिय ला नीना (La Nina) को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की वैश्विक लड़ाई में स्थानीय कार्यवाही की प्रासंगिकता को लगातार सिद्ध करने के लिए भारत सरकार ने उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग को वैश्विक पटल पर अपने नवाचारों को पूरी दुनिया के शीर्ष नेतृत्व के समक्ष प्रस्तुत करने का एक मौका देना का फैसला किया है।
