शनि देव (Shani Dev) अच्छे कर्म करने वालों के लिए जितने कृपालु हैं, तो वहीं बुरे कर्म करने वालों के लिए उतने ही दंडाधिकारी हैं। रुष्ट हों तो शनि आर्थिक कष्ट देते हैं। जब शनि कुंडली के नीच भाव में हो तो धन हानि होती है।
शनि के व्रत में श्रद्धा-भक्ति तथा पूर्ण समर्पण भाव सहित स्वयं के कष्ट निवारण का आग्रह मन ही मन करना चाहिए। व्रत करने वाले स्त्री-पुरुष को चाहिए कि शनिवार को प्रात:काल स्नान कर सर्वप्रथम देव, ऋषि तथा पितृ तर्पण करें। पीपल अथवा शमी वृक्ष के नीचे भक्तिपूर्वक वेदी बनाकर उसे गौ के गोबर से लीप देना चाहिए।
सूर्य पुत्र शनिदेव (Shanidev) को लेकर समाज में कई तरह की भ्रांतियां फैली हुई हैं कि वह गुस्सैल, भावहीन और निर्दयी हैं। लेकिन यह सत्य नहीं है, शनिदेव न्याय के देवता हैं। इसी वजह से भगवान शिव ने शनि महाराज को नवग्रहों में न्यायाधीश का काम सौंपा है।
पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार एक बार अयोध्या के राजा दशरथ ज्योतिषियों के साथ बैठे हुए थे तो उन...

