छत्तीसगढ़ में एक ऐसा शनि मंदिर हैं, जहां शनि देव अपनी पत्नी के साथ विराजित है। एक तरफ जहां शनि मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है, वहीं यह एक अनोखा मंदिर है जहां पति-पत्नी साथ पूजा करते हैं।
दुर्गा पूजा सबसे महत्वपूर्ण हिंदू त्योहारों में से एक है, खासकर पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, त्रिपुरा, बिहार और बांग्लादेश में, लेकिन पूरे भारत में भी मनाया जाता है। यह केवल एक धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि एक विशाल सांस्कृतिक उत्सव भी है।
शंकर जी बोले-हे उमा, कालकारमुख नामक एक भयानक बलवान राक्षस हुआ। ग्यारह मुख वाले उस विकराल राक्षस ने बहुत काल...
भगवान के हरिहर स्वरूप का क्या है रहस्य? क्या है भगवान के ‘हरिहर अवतार’ का प्रसंग? शैव और वैष्णवों में आपसी मतभेद मिटाने के लिए भगवान शिव और विष्णु ने किस तरह लीला कर संसार को संदेश दिया कि परमात्मा एक ही है, चाहे किसी भी मार्ग से उसकी उपासना की जाए।
बजरंगबली (Bajrangbali) ने शनि महाराज (Shani Maharaj) को कष्टों से मुक्त कराया था और उनकी रक्षा की थी इसलिए शनि देवता (Shani Devta) ने यह वचन दिया था हनुमानजी की उपासना करने वालों को वे कभी कष्ट नहीं देंगे। शनि या साढ़े साती की वजह से होने वाले कष्टों के निवारण हेतु हनुमानजी की आराधना करनी चाहिए।
सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा जी के मुख से 'ऊँ' प्रकट हुआ था, वही सूर्य का प्रारम्भिक सूक्ष्म स्वरूप था। इसके बाद भूः भुव तथा स्व शब्द उत्पन्न हुए। ये तीनों शब्द पिंड रूप में 'ऊँ' में विलीन हए तो सूर्य को स्थूल रूप मिला। सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन्न होने से इसका नाम आदित्य पड़ा।
अनमोल कुमार छंटे हुए तेज से विष्णु का सुदर्शन चक्र, अमोघ यमदंड, शंकर का त्रिशूल, काल का खड्ग, कार्तिकेय को...
धीरेंद्र शास्त्री का मानना है कि उन्हें जो भी ज्ञान व अलौकिक शक्तियां प्राप्त हुई। वह सभी उनके दादाजी और सन्यासी बाबा की कृपा का ही परिणाम है।
जब भगवान श्री कृष्ण (Lord Krishna) अपने बाल्यावस्था में थे। उस समय ब्रह्मा जी को पता चला कि भगवान विष्णु स्वयं श्री कृष्ण के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं, तो उनके मन में श्री कृष्ण के दर्शन करने का विचार आया। वह ब्रह्मलोक से पृथ्वी पर आए और देखा कि अपने सिर पर मोर मुकुट को धारण किए एक बालक गायों और ग्वालों के साथ मिट्टी में खेल रहा है।
उत्तराखंड की धर्मनगरी हरिद्वार में प्रसिद्ध माँ चंडी देवी का मंदिर (Chandi Devi Mandir) है। देश में मौजूद 52 पीठों में से एक नील पर्वत पर स्थित इस मंदिर में मां खंभ के रूप में विराजमान है। वैसे तो यहां साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन मान्यता है की नवरात्र के दौरान जो भक्त माता के इस दरबार में सच्चे मन प्रार्थना करता है, मां उसकी हर मन्नत पूरी करती है।
हनुमानजी को आने जाने के लिये मात्र दो घण्टे का समय मिला था। इस मात्र दो घंटे में हनुमान जी द्रोणगिरी पर्वत हिमालय पर जाकर वापस 5000 किलोमीटर की यात्रा करके आये थे। अर्थात उनकी गति ढाई हजार किलोमीटर प्रति घंटा रही होगी।
छोटे से लेकर बडों तक सभी को समीप के प्रतीत होनेवाले भगवान अर्थात ‘पवनपुत्र’! पवनपुत्र का अन्य सर्वपरिचित नाम है...






