सूर्यदेव भगवान् विष्णु को गुरु मानकर उनके उत्तर भाग में आज भी स्थित हैं इसलिए वे केशवादित्य के नाम से प्रसिद्ध हैं। वे काशी में अपने भक्त के अज्ञानमय अंधकार को दूर करते हैं और उनसे प्रसन्न होकर उन्हें मनोवांछित सिद्धि देते हैं।
जब भगवान शिव देवी सती की मृत्यु के बाद उन्हें कैलाश पर्वत ले जा रहे थे तो उनकी एक आंख नैनीताल में गिर पड़ी थी, जबकि दूसरी आंख हिमाचल के बिलासपुर में गिरी थीं। यही कारण है कि देवी का ये मंदिर शक्तिपीठ में शामिल हैं।
एक बार भगवान कृष्ण (Lord Krishna) के मन में आया कि आज गोपियों को अपना ऐश्वर्य दिखाना चाहिये। ये सोचकर जब भगवान निकुंज में बैठे थे, और गोपियाँ उनसे मिलने आ रही थी। तब भगवान कृष्ण विष्णु (Lord Vishnu) के रूप चार भुजाएँ प्रकट कर के बैठ गए। जिनके चारो हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म था।
हनुमान जी (Hanuman ji) और अंगद जी (Angad ji) दोनों ही समुद्र लाँघने में सक्षम थे, फिर पहले हनुमान जी लंका क्यों गए? अंगद जी बुद्धि और बल में बाली के समान ही थे। समुद्र के उस पार जाना भी उनके लिए बिल्कुल सरल था। किन्तु वह कहते हैं कि लौटने में मुझे संशय है। आखिर कौन सा संशय था उन्हें? जानिए पूरी कथा।
हिंदू संस्कृति (Hindu Culture) में प्रति दिन सुबह सूर्य को जल देने की परंपरा है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि क्यों देते हैं सूर्य को जल (Surya ko Jal) और क्या हैं इसके कारण।
एक तो ब्रजरज का स्वाद, दूजा श्री राधा जी के हाथ का स्पर्श लड्डू। अमृत को फीका करे, ऐसा स्वाद लड्डू का।
शनि देव के पैर में खराबी का गवाह है अक्षयपुरीश्वर मंदिर
भोजपुर जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर की दूर पर स्थित बिहिया में स्थापित है लोक आस्था की प्रतीक प्रसिद्ध महथिन माई मंदिर (Mahathin Mai Mandir)। महथिन माई के प्रति लोगों की गहरी आस्था है।
जानें, कलश स्थापना और पूजा-विधि
आज एक विशेष शिव मंदिर के बारे में बता रहे हैं, जिसे मनुष्य नहीं, बल्कि पारलौकिक शक्तियों ने बनाया है। यह एलोरा (Ellora) का कैलाश मंदिर (Kailash Temple) है जो कि औरंगाबाद (Aurangabad) में है।
शनिदेव (Shanidev) अत्यंत करुणा की मूर्ति है दुनिया जबरन उनसे भय खाती है। वह जब मनुष्यों पर आते हैं तो मनुष्य निर्बल नहीं अपितु समय से दो-दो हाथ करने के लिए सबल हो जाता है। उसमें अन्याय से लड़ने की उसमें जबरदस्त शक्ति आ जाती है।
द्वारका धाम गुजरात के काठियावाड क्षेत्र में अरब सागर के समीप स्थित है। मथुरा से जाने के बाद श्री कृष्ण ने इस विशाल नगर की स्थापना की थीं।












