ECI Controversy: पिछले कुछ हफ्तों से भारत का चुनाव आयोग (ECI) कई मुद्दों को लेकर चर्चा और विवाद के केंद्र में है। इनमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद शामिल हैं।
तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा दो अन्य चुनाव आयुक्त होते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर तीनों आयुक्तों की राय एक-दूसरे से अलग हो जाए, तो अंतिम फैसला कैसे लिया जाएगा?
यह मुद्दा अभी क्यों चर्चा में है?
चुनाव आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर सवाल ऐसे समय उठे हैं जब आयोग की कार्यप्रणाली पर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस जारी है।
सितंबर में प्रकाशित द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग के दो सदस्यों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले 10 महीनों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्ति जताई थी।
हालांकि, चुनाव आयोग ने इस रिपोर्ट के जवाब में कहा था कि किसी संस्था के भीतर अलग-अलग राय और विचार सामने आना निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है। आयोग के मुताबिक, अंतिम निर्णय पर पहुंचने से पहले सदस्यों के बीच चर्चा और विचार-विमर्श होता है।
ECI की वेबसाइट के अनुसार, आयोग नियमित बैठकों और दस्तावेजों के आदान-प्रदान के माध्यम से काम करता है और निर्णय लेने की प्रक्रिया में सभी चुनाव आयुक्तों की समान भूमिका होती है।
2023 के कानून की धारा 18 क्या कहती है?
चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया को समझने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 महत्वपूर्ण है।
इस प्रावधान के तहत आयोग अपने कामकाज और सदस्यों के बीच कार्यों के बंटवारे को लेकर प्रक्रिया तय कर सकता है। कानून में यह भी कहा गया है कि आयोग को जहां तक संभव हो, अपने फैसले सर्वसम्मति (consensus) से लेने चाहिए।
लेकिन यदि किसी मुद्दे पर सर्वसम्मति नहीं बनती, तो मतभेद की स्थिति में बहुमत (majority) के आधार पर फैसला लिया जाता है।
यानी तीन सदस्यीय आयोग में सामान्य स्थिति में किसी मुद्दे पर दो आयुक्त एक राय पर हों और तीसरे की राय अलग हो, तो दो सदस्यों की राय बहुमत मानी जाएगी।
अगर तीनों चुनाव आयुक्तों की राय अलग-अलग हो तो?
यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम कानूनी सवाल है।
लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य ने लाइवमिंट से बातचीत में कहा कि कानून में मुख्य रूप से दो स्थितियों का प्रावधान है—पहली, सर्वसम्मति से फैसला और दूसरी, सर्वसम्मति नहीं बनने पर बहुमत से फैसला।
लेकिन अगर तीनों चुनाव आयुक्तों की राय पूरी तरह अलग-अलग हो और किसी भी दो आयुक्तों की राय एक जैसी न हो, तो बहुमत की स्थिति नहीं बनती।
आचार्य के मुताबिक, ऐसी स्थिति में कानून में किसी एक राय को स्वतः अंतिम फैसला मानने का अलग प्रावधान नहीं है। इसका अर्थ यह होगा कि संबंधित मुद्दे पर उस समय बहुमत आधारित निर्णय नहीं लिया जा सकेगा और मामले पर गतिरोध की स्थिति पैदा हो सकती है।
हालांकि, धारा 18 में तीनों सदस्यों की अलग-अलग राय वाली स्थिति के लिए अलग से विस्तृत प्रक्रिया नहीं बताई गई है। इसलिए ऐसी असाधारण स्थिति में आगे की प्रक्रिया कानूनी और संस्थागत व्याख्या का विषय बन सकती है।
क्या CEC के पास वीटो पावर होती है?
यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त अन्य दो आयुक्तों की राय को दरकिनार कर अकेले फैसला ले सकते हैं।
मौजूदा कानूनी ढांचे के तहत ECI एक बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में काम करता है। CEC आयोग का नेतृत्व करते हैं, लेकिन अन्य चुनाव आयुक्त भी निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं।
इस मुद्दे पर 1995 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ महत्वपूर्ण माना जाता है।
तत्कालीन CEC टी.एन. शेषन ने चुनाव आयोग को बहु-सदस्यीय बनाए जाने को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी चुनौती को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के बाद आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में कार्य करता है।
इसका मतलब यह है कि CEC के पास अन्य चुनाव आयुक्तों के ऊपर कोई अलग सर्वोच्च या वीटो शक्ति नहीं है।
क्या CEC ‘First Among Equals’ हैं?
इस बहस में ‘Primus Inter Pares’, यानी ‘बराबरों में प्रथम’ की अवधारणा भी महत्वपूर्ण है।
इसका सामान्य अर्थ है कि CEC आयोग का प्रमुख होता है, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया में अन्य चुनाव आयुक्त भी समान संस्थागत भूमिका रखते हैं।
इसलिए CEC का पद नेतृत्वकारी जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह अकेले किसी फैसले को अंतिम रूप दे सकते हैं या अन्य आयुक्तों की असहमति को वीटो कर सकते हैं।
आसान भाषा में समझें
तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में किसी मुद्दे पर स्थिति को इस तरह समझा जा सकता है:
तीनों सहमत हैं → सर्वसम्मति से फैसला।
दो आयुक्त एक राय पर हैं और एक असहमत है → बहुमत की राय लागू होगी।
तीनों की राय अलग-अलग है → किसी राय को बहुमत हासिल नहीं है; ऐसी स्थिति में कानून में स्पष्ट ‘कास्टिंग वोट’ या CEC के अतिरिक्त निर्णायक वोट का प्रावधान नहीं बताया गया है।
निष्कर्ष
ECI की मौजूदा संरचना में निर्णय प्रक्रिया सामूहिक है। कानून सर्वसम्मति को प्राथमिकता देता है, लेकिन मतभेद की स्थिति में बहुमत के आधार पर फैसला लेने का प्रावधान करता है।
हालांकि, तीनों आयुक्तों के पूरी तरह अलग-अलग मत रखने जैसी असाधारण स्थिति के लिए कानून में कोई स्पष्ट अलग प्रक्रिया नहीं दी गई है। इसी वजह से ऐसी स्थिति में संवैधानिक प्रावधानों, संबंधित कानून और न्यायिक व्याख्या की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
फिलहाल, ECI के भीतर मतभेद की खबरों के बीच यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह समझने में मदद मिलती है कि भारत का चुनाव आयोग एक व्यक्ति के बजाय बहु-सदस्यीय संस्था के रूप में कैसे निर्णय लेता है।
(एजेंसी इनपुट के साथ)

