इंसान की गतिविधियों की वजह से पैदा हुए जलवायु परिवर्तन (Climate Change) ने बांग्लादेश, भारत, लाओस और थाईलैंड में रिकॉर्ड तोड़ उमस भरी ताप लहर (Heatwave) की संभावनाओं को 30 गुना तक बढ़ा दिया है।
क्या आप किसी विषय को बीस से तीस सेकंड में समझने की कल्पना कर सकते हैं? अगर नहीं, तो आपको ऐसी कोई कल्पना करने की ज़रूरत नहीं। क्योंकि यह एक हक़ीक़त है। तो क्या है ये हक़ीक़त, इसे जानने के लिए यह लेख अंत तक पढ़िये
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (World Meteorological Organization) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, पहाड़ की चोटियों से लेकर समुद्र की गहराई तक, जलवायु परिवर्तन (Climate Change) ने 2022 में अपनी प्रगति बरक़रार रखी।
भारत सरकार का पशुपालन और डेयरी विभाग आज गोवा में आयोजित होने वाले जी-20 स्वास्थ्य कार्य समूह के कार्यक्रम में शामिल हो रहा है। इस आयोजन का मूल विषय वन हेल्थ एजेंडा की रणनीति और संचालन है।
जी20 देशों के अध्यक्ष के रूप में भारत के पास वैश्विक स्तर पर न्यायसंगत ट्रांज़िशन (equitable transition) के वित्तपोषण तथा कई अन्य पहलुओं पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का मौका है।
ऊर्जा क्षेत्र की देश की अग्रिणी सार्वजनिक गैर बैंकिंग वित्तीय कम्पनियां (NBFC) पीएफसी और आरईसी नई प्रौद्योगिकियों (पवन बिजली सौर ऊर्जा बैटरी स्टोरेज और इलेक्ट्रिक वाहन आदि) के हिसाब से खुद को पर्याप्त रूप से बदल नहीं पाई हैं जिसके चलते इनके विकास और मुनाफ़ा कमाने की दर ठहरी हुई है।
पैरिस समझौते (Paris Agreement) के बाद से पवन और सौर ऊर्जा के कारण जी20 देशों में कोयले से बनने वाली बिजली की हिस्सेदारी में गिरावट आयी है।
हर साल, मध्यप्रदेश के धार ज़िले में किसान समुदाय अक्षय तृतीया से ही खेती संबंधी तैयारी में जुट जाते हैं। यह किसान अक्षय तृतीया पर जमीनों के सौदे और खेतों को किराए पर देने से लेकर अन्य व्यवस्थाओं को भी इसी समय तय कर लेते हैं।
वैश्विक स्तर पर शुद्ध ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के मामले में स्वास्थ्य क्षेत्र पांचवें स्थान पर है। ऐसे में देश की स्वास्थ्य क्षेत्र की तैयारियों को जलवायु परिवर्तन के दृष्टिगत संबोधित करने के महत्व पर चर्चा करने के लिए, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) के साथ साझेदारी में एशियाई विकास बैंक ने आज गोवा में G20 के लिए स्वास्थ्य कार्य समूह में एक साइड इवेंट का आयोजन किया।
देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि, और अन्य सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक प्रणालियों पर बोझ डालते हुए भारत में फिलहाल हीटवेव अपनी आवृत्ति, तीव्रता, और घातकता में बढ़ रही हैं।
जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के अंतर सरकारी पैनल (IPCC) के सदस्य वैज्ञानिकों का। इन वैज्ञानिकों ने आज अपनी नवीनतम रिपोर्ट में साफ़ किया है कि अगर हम अब भी मौजूदा संसाधनों का सही रणनीतिक प्रयोग करते हैं तो जलवायु परिवर्तन की चोट के असर को काफ़ी कम कर सकते हैं।
पिछले वर्षों की अभूतपूर्व बाढ़, सूखा और बेतहाशा पानी से होने वाली घटनाएं अप्रत्याशित नहीं, बल्कि मानव द्वारा दशकों से चली आ रही पानी की बदइंतज़ामी से होने वाली सिस्टेमेटिक क्राइसेस का नतीजा हैं। यह कहना है ग्लोबल कमीशन ऑन इक्नोमिक्स ऑफ वॉटर रिपोर्ट (Global Commission on Economics of Water Report) का।











