उज्जैन (Ujjain) से करीब 6 किलोमीटर दूर श्री चिंताहरण गणेश मंदिर (Shri Chintaharan Ganesh Temple) में भगवान श्री गणेश के तीन रूप एक साथ विराजमान है। जो चितांमण गणेश, इच्छामण गणेश और सिद्धिविनायक के रूप में जाने जाते है।
उत्तराखंड (Uttarakhand) पिथौरागढ़ (Pithoragarh) जिला से करीब 90 किलोमीटर दूर गंगोलीहाट के भुवनेश्वर गांव में पाताल भुवनेश्वर गुफा (Patal Bhubaneswar Cave) स्थित है। यह गुफा समुद्र तल से 1350 किलोमीटर की ऊंचाई पर है। यह गुफा किसी आश्चर्य से कम नहीं है। यह प्रवेश द्वार से 160 मीटर लंबी और 90 फीट गहरी है।
भगवान गणेश (Lord Ganesha) के शीश कटने को लेकर पुराणों में कई कथाएं प्रचलित हैं। इन्हीं में से एक कथा है कि शनिदेव (Shanidev) के कारण ही भगवान गणपति का शीश कटा था। ब्रह्मवैवर्तपुराण में इस कथा का वर्णन है।
जब भगवान श्री कृष्ण (Lord Krishna) अपने बाल्यावस्था में थे। उस समय ब्रह्मा जी को पता चला कि भगवान विष्णु स्वयं श्री कृष्ण के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं, तो उनके मन में श्री कृष्ण के दर्शन करने का विचार आया। वह ब्रह्मलोक से पृथ्वी पर आए और देखा कि अपने सिर पर मोर मुकुट को धारण किए एक बालक गायों और ग्वालों के साथ मिट्टी में खेल रहा है।
बजरंगबली (Bajrangbali) को भगवान भोलेनाथ का ग्यारहवां अवतार भी माना गया है। उन्हें कलयुग का देवता कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो भी व्यक्ति मंगलवार को विधि-विधान से हनुमान जी की पूजा करता है, उसके जीवन के सारे संकट दूर हो जाते हैं।
जब श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे थे तब उन्होंने ये भी बोला था कि ये उपदेश पहले भगवान विष्णु (Bhagwan Vishnu) के रूप में सूर्यदेव को दे चुके हैं। तब अर्जुन ने आश्चर्य से कहा कि सूर्यदेव तो प्राचीन देवता हैं, आप उनको ये उपदेश पहले कैसे दे सकते हैं।
भारत में एक जगह ऐसी है जहां हनुमान जी (Hanuman ji) की पूजा नहीं की जाती है। यह जगह है उत्तराखंड स्थित द्रोणागिरि गांव। यहां के लोगों का मानना है कि हनुमान जी जिस पर्वत को संजीवनी बूटी के लिए उठाकर ले गए थे, वह यहीं स्थित था। चूंकि द्रोणागिरि के लोग उस पर्वत की पूजा करते थे, इसलिए वे हनुमानजी द्वारा पर्वत उठा ले जाने से नाराज हो गए। यही कारण है कि आज भी यहां हनुमान जी की पूजा नहीं होती।
राजस्थान (Rajasthan) में झालरापाटन (Jhalrapatan) का सूर्य मंदिर (Surya Mandir) अपनी प्राचीनता और स्थापत्य वैभव के कारण कोणार्क के सूर्य मंदिर और ग्वालियर (Gwalior) के 'विवस्वान मंदिर' (Vivaswan Temple) का स्मरण कराता है।
माता आदिशक्ति के 51 पीठों की तरह ही कोल्हापुर में 27 हजार वर्गफुट में फैला माता महालक्ष्मी (Mahalakshmi) का शक्तिपीठ विश्व प्रसिद्ध है। 2000 साल पुराने इस मंदिर को सबसे प्राचीन माना जाता है।
उत्तराखंड (Uttarakhand) में गढ़वाल मंडल (Gharwal) के चमोली जिले में सोनप्रयाग से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर मुंडकटिया मंदिर है। यह विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहाँ बिना सिर के भगवान गणेश जी की पूजा की जाती है।
गैर-हिंदू को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं
तमिलनाडु के पेरावोरानी के पास तंजावूर के विलनकुलम में अक्षयपुरीश्वर मंदिर (Akshayapureeswarar Temple) है। ये मंदिर भगवान शनि के पैर टूटने की घटना से जुड़ा हुआ है। इस मंदिर में शारीरिक रुप से परेशान और साढ़े साती में पैदा हुए लोग शनिदेव की विशेष पूजा के लिए आते हैं।
