इंदौर के हृदय स्थल राजवाड़ा में एक ऐसा प्राचीन महालक्ष्मी मंदिर है, जहां दीपावली के अवसर पर लाखों भक्तों की भीड़ अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए पूजा-अर्चना करती है। यहां महालक्ष्मी के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।
एक बार गणपति (Ganapati) मुनि पुत्रों के साथ पाराशर ऋषि के आश्रम में खेल रहे थे, तभी वहां कुछ नाग कन्याएं आ गईं। ये नाग कन्याएं गणेश को आग्रह पूर्वक अपने लोक लेकर जाने लगी। गणपति भी उनका आग्रह ठुकरा नहीं सके और उनके साथ चले गए। नाग लोक पहुंचने पर नाग कन्याओं ने उनका हर तरह से सत्कार किया। तभी नागराज वासुकि ने गणेश को देखा और उपहास के भाव से उनके रूप का वर्णन करने लगे। गणेश को क्रोध आ गया। उन्होंने वासुकि के फन पर पैर रख दिया और उनके मुकुट को भी स्वयं पहन लिया।
महाभारत के एक खंड में दी गई जानकारी के अनुसार भगवान शिव, पार्वती और नारद जी के बीच हो रही बातचीत के दौरान बताया गया है कि शिव जी की तीसरी आंख कैसे उत्पन्न हुई थी और क्या है इसका रहस्य!
तमिलनाडु के मदुरै में भगवान विष्णु (Bhagwan Vishnu) को समर्पित अनोखा कूडल अझगर मंदिर (Koodal Azhagar Mandir) है। आठ हिस्सों में बने हुए इस मंदिर का शिखर ऐसा है, जिसकी परछाई धरती पर नहीं पड़ती। इस मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति बैठी हुई मुद्रा में है। यह मूर्ति देखने में बहुत ही दिव्य और भव्य लगती है।
लाल पताका जिस पर श्री राम लिखा और हनुमान जी का चित्र अंकित हो, घर के आगे लगाने वाले बंधनवार जो कि लाल रक्षासूत्र से बने हो। ये सब हनुमान जी के चिन्ह हैं। इन्हें घर पर लगाने से स्वतः ही प्रभु के होने का आभास होता है।
हिंदुओं की आस्था के केंद्र यमुनोत्री धाम स्थान यमुनोत्तरी हिमनद से 5 मील नीचे दो वेगवती जलधाराओं के मध्य एक कठोर शैल पर है। बांदरपूंछ के पश्चिमी छोर के एक संकरे स्थान पर पवित्र यमुनाजी का मंदिर है।
भगवान श्री कृष्ण (Shri Krishna) का पांचजन्य शंख (Panchajanya Shankh) बड़ा ही विशिष्ट शंख है, यह दुर्लभ है। कहते हैं इस शंख की उत्पत्ति समुद्र मंथन के समय हुई थी। समुद्र मंथन में उत्पन्न रत्नों में छठा रत्न यही शंख था और उसके पश्चात भगवान विष्णु के पास माता लक्ष्मी तथा यह शंख सुशोभित हुए। किन्तु महाभारत में भी इस शंख की उपस्थिति का वर्णन है।
त्रेतायुग में भगवान श्रीराम (Shri Ram) की सहायता करने और दुष्टों का नाश करने के लिए देवाधिदेव महादेव भगवान शिव ने वानर जाति में हनुमान (Hanuman) के रूप में अवतार लिया था। हनुमान को भगवान शिव का श्रेष्ठ अवतार कहा जाता है।
शनिवार के दिन शनिदेव (Shanidev) की पूजा करने का विधान है। शनिदेव की पूजा करते समय इन मंत्रों का पाठ किया जाए तो शनिदेव प्रसन्न होते हैं। शनिदेव की पूजा करने से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। साथ ही जिन लोगों पर साढ़ेसाती चल रही होती है वह भी सही हो जाता है।
उत्तराखंड (Uttarakhand) में देवी-देवताओं के कई चमत्कारिक मंदिर हैं। इन्हीं में से एक मंदिर गोलू देवता (Golu Devta Mandir) का भी है। गोलू देवता को स्थानीय मान्यताओं में न्याय का देवता कहा जाता है।
काल भैरव के काशी में स्थापित होने के पीछे एक बहुत ही रोचक पौराणिक कथा है।
इस मंदिर की स्थापना भवानी मिश्र नामक तांत्रिक ने लगभग 400 साल पहले की थी। उसके बाद से ही मंदिर की पूजा-आरती का जिम्मा तांत्रिक के ही परिवार के सदस्य संभालते आए हैं। यहां माता की प्राण-प्रतिष्ठा तंत्र साधना से ही की गई है। तांत्रिकों की आस्था इस मंदिर के प्रति अटूट है।
