काल भैरव के काशी में स्थापित होने के पीछे एक बहुत ही रोचक पौराणिक कथा है।
इस मंदिर की स्थापना भवानी मिश्र नामक तांत्रिक ने लगभग 400 साल पहले की थी। उसके बाद से ही मंदिर की पूजा-आरती का जिम्मा तांत्रिक के ही परिवार के सदस्य संभालते आए हैं। यहां माता की प्राण-प्रतिष्ठा तंत्र साधना से ही की गई है। तांत्रिकों की आस्था इस मंदिर के प्रति अटूट है।
ऋषि कश्यप की कई पत्नियां थीं, जिनमें से दो वनिता और कद्रू थी। ये दोनों ही बहनें थी, जो एक दूसरे से ईर्ष्या रखती थी। दोनों के पुत्र नहीं थे तो पति कश्यप ने दोनों को पुत्र के लिए एक वरदान दे दिया। वनिता ने दो बलशाली पुत्र मांगे जबकि कद्रू ने हजार सर्प पुत्र रूप में मांगे जो कि अंडे के रूप में जन्म लेने वाले थे। सर्प होने के कारण कद्रू के हजार बेटे अंडे से उत्पन्न हुए और अपनी मां के कहे अनुसार काम करने लगे।
श्रीराम अवतार के समय हनुमान जी को स्वयं भगवान श्रीराम ने अमर होने का आशीर्वाद दिया था। इसी कारण हनुमानजी का प्रताप चारों युगों में रहा है और आगे भी रहेगा, क्योंकि वे अजर-अमर हैं। अंजनी सुत जब तक चाहें शरीर में रहकर इस धरती पर मौजूद रह सकते हैं।
उत्तराखंड (Uttarakhand) के हरिद्वार (Haridwar) में एक प्राचीन मां चंडी देवी मंदिर(Chandi Devi Mandir) है। मां चंडी देवी को चंडिका देवी के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर शक्ति स्वरुप मां चंडी देवी को समर्पित है। यहां माता खंभ के रूप में विराजमान है।
पुणे से 51 किमी दूर रंजनगांव में एक पौराणिक गणपति मंदिर है। हिन्दू धर्म ग्रंथों के मुताबिक इस स्थान पर...
हिंदुओं की आस्था के केंद्र यमुनोत्री धाम स्थान यमुनोत्तरी हिमनद से 5 मील नीचे दो वेगवती जलधाराओं के मध्य एक कठोर शैल पर है। बांदरपूंछ के पश्चिमी छोर के एक संकरे स्थान पर पवित्र यमुनाजी का मंदिर है।
देश में अनेक मंदिर ऐसे हैं, जो अपने अंदर तमाम अनसुलझे रहस्यों को समेटे हुए है। विज्ञान भी इसकी तह तक नहीं जा सका। ऐसा ही है छत्तीसगढ़ के गरियाबंद शहर से 12 किलोमीटर दूर हरी-भरी पहाड़ियों पर स्थित निराई माता मंदिर (Nirai Mata Mandir)।
वास्तुशास्त्र के दोष दूर करने के लिहाज से भगवान गणेश (Lord Ganesha) की प्रतिमा बेहद उपयोगी सिद्ध हो सकती है। नए घर में प्रवेश से लेकर उसमें रहते हुए आप कई तरह से गणेशजी की प्रतिमा का इस्तेमाल कर सकते है।
सूर्यदेव के रथ को संभालने वाले इन सात घोड़ों के नाम हैं- गायत्री, भ्राति, उस्निक, जगति, त्रिस्तप, अनुस्तप और पंक्ति। कहा जाता है कि यह सात घोड़े एक सप्ताह के सात दिनों को दर्शाते हैं। यह तो महज एक मान्यता है जो वर्षों से सूर्य देव के सात घोड़ों के संदर्भ में प्रचलित है लेकिन क्या इसके अलावा भी कोई कारण है, जो सूर्यदेव (Suryadev) के इन सात घोड़ों की तस्वीर और भी साफ करता है।
उत्तर भारत का तिरुपति के तौर पर विकसित किया जा रहा धाम को
भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए शास्त्रों में कई विधि-विधान बताए गए हैं। जिसमें भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, दूध अर्पित करने आदि का भी उल्लेख मिलता है। आइए जानें कि शिवलिंग पर दूध क्यों चढ़ाया जाता है और ऐसा करने से क्या होता है?
