सूर्यदेव (Suryadev) एक ऐसे देवता जिनके साक्षात दर्शन हमें प्रतिदिन नसीब होते हैं। जिनके प्रताप से ही हम समय की खोज कर सके हैं। जिन्हें समस्त ग्रहों का राजा माना जाता है। जिन्हें आदित्य, भास्कर, मार्तण्ड आदि अनेक नामों से जाना जाता है।
कराची शहर में स्थित इस पंचमुखी हनुमान मंदिर को बेहद चमत्कारी माना जाता है। यह मंदिर सबसे अलग और अनोखा है।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, जब श्रीराम अयोध्या के राजा थे, तब एक दिन काल (मृत्यु) तपस्वी के रूप में अयोध्या आया। काल ने श्रीराम से अकेले में बात करने की इच्छा प्रकट की और कहा कि यदि कोई हमें बात करता हुआ देख ले तो वह आपके द्वारा मारा जाए।
भगवान शिव के फल से ज्येष्ठ की अमावस्या में भगवान शनिदेव (Shanidev) का जन्म हुआ। सूर्य के तेज और तप के कारण शनिदेव का रंग काला हो गया। लेकिन माता की घोर तपस्या के कारण शनि महाराज में अपार शक्तियों का समावेश हो गया।
सदियों से मौसम की मार झेल रहा यह मंदिर आज भी खड़ा है। पांडवों के बाद आज से लगभग 1000 वर्ष पहले 1060 ईं में राजा मांबाणि ने इस मंदिर का पुनः जीर्णोद्धार करवाया।
विघ्नों के नाशक माने जाने वाले भगवान गणेश (Lord Ganesha) ने कभी तुलसी के प्रेम को अस्वीकार कर दिया था और नाराज होकर उसे शाप भी दिया था। फिर गणेश जी ने भी तुलसी को शाप दिया।
Apara Ekadashi 2023: आज सोमवार 15 मई को अपरा एकादशी है। इस एकादशी का व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करने से अपार पुण्यफल की प्राप्ति होती है, इसलिए इसे अपरा एकादशी कहा जाता है।
लंका कूच के पहले भगवान राम ने की थी पूजा, श्रीकृष्ण ने यहीं गणेश जी को मनाया था
इस साल वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) के दिन बेहद शुभ संयोग बन रहा है। चूंकि इस साल शनि जयंती भी इसी दिन पड़ रही है। इसके अलावा शनि के कुंभ राशि में होने से शश महापुरुष योग का निर्माण हो रहा है।
झालरापाटन का यह विशाल सूर्य मंदिर, पद्मनाथजी मंदिर, बड़ा मंदिर, सात सहेलियों का मंदिर आदि अनेक नामों से प्रसिद्ध है। मंदिर का निर्माण खजुराहो एवं कोणार्क शैली में हुआ है। यह शैली ईसा की दसवीं से तेरहवीं सदी के बीच विकसित हुई थी।
विभीषण ने हनुमानजी की स्तुति में एक बहुत ही अद्भुत और अचूक स्तोत्र की रचना की है। विभीषण द्वारा रचित इस स्तोत्र को 'हनुमान वडवानल स्तोत्र' कहते हैं।
एक बार देवर्षि नारद विष्णु भगवान (Lord Vishnu) से मिलने गए। भगवान ने उनका बहुत सम्मान किया। लेकिन जब नारद जी वापिस गए, तो विष्णुजी ने कहा- हे लक्ष्मी जिस स्थान पर नारद जी बैठे थे, उस स्थान को गाय के गोबर से लीप दो।












