धर्म-कर्म

जब भगवान शंकर ने ली श्रीराम की मर्यादा की परीक्षा!

भगवान शंकर (विश्वनाथ) की अर्धांगिनी हैं माता अन्नपूर्णा । माता पार्वती ही सृष्टिकाल में महामाया, पालन करते समय अन्नपूर्णा और संहार करते समय कालरात्रि कहलाती हैं । भगवान शंकर का परिवार बहुत लम्बा है—स्वयं शंकरजी पंचानन, पुत्र गजानन और षडानन, तीन बहुएं, दो पोते फिर इन सबके वाहन, इसके अलावा नन्दी-भृंगी एवं श्रृंगी और बहुत […]

भगवान शंकर (विश्वनाथ) की अर्धांगिनी हैं माता अन्नपूर्णा । माता पार्वती ही सृष्टिकाल में महामाया, पालन करते समय अन्नपूर्णा और संहार करते समय कालरात्रि कहलाती हैं । भगवान शंकर का परिवार बहुत लम्बा है—स्वयं शंकरजी पंचानन, पुत्र गजानन और षडानन, तीन बहुएं, दो पोते फिर इन सबके वाहन, इसके अलावा नन्दी-भृंगी एवं श्रृंगी और बहुत खाने वाले भूत-प्रेतों का समुदाय। इन सबकी क्षुधा-पिपासा शान्त करने का जिम्मा माता अन्नपूर्णा का है ।

Purnagiri Mandir: विश्वास और आस्था का प्रतीक पूर्णागिरी का दरबार, दर्शनों से होती है सभी मन्नतें पूरी

माता अन्नपूर्णा की आराधना करने से मनुष्य को कभी अन्न का दु:ख नहीं होता है क्योंकि वे नित्य अन्न-दान करती हैं । यदि माता अन्नपूर्णा अपनी कृपादृष्टि हटा लें तो मनुष्य दर-दर अन्न-जल के लिए भटकता फिरे लेकिन उसे चार दाने चने के भी प्राप्त नहीं होते हैं। एक बार भगवान शंकर की आज्ञा से माता अन्नपूर्णा ने महर्षि वेदव्यास की तरफ से दृष्टि फेर ली, वेदव्यासजी अपने शिष्यों सहित दो दिनों तक काशी की गलियों में भिक्षा के लिए आवाज लगाते रहे, किन्तु उनको और उनके शिष्यों को कहीं से भी कुछ भी भिक्षा न मिल सकी ।

Kamakhya Shakti Peeth: तांत्रिक, छुपी हुई शक्तियों की प्राप्ति का महाकुंभ कामाख्या शक्ति पीठ

भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश की लीलाएं अत्यन्त न्यारी हैं । अपने भक्तों की परीक्षा वे अद्भुत तरीके से लेते रहते हैं। ऐसी ही परीक्षा भगवान शंकर ने अपने भक्त भगवान श्रीराम की ली थी।

दुर्गा सप्तशती चमत्कार नहीं एक वरदान है…जानें दुर्गा सप्तशती पाठ के चमत्कार

एक बार अयोध्या में राघवेंद्र भगवान श्रीराम ने अपने पितरों का श्राद्ध करने के लिए ब्राह्मण-भोजन का आयोजन किया। ब्राह्मण भोजन में सम्मिलित होने के लिए दूर-दूर से ब्राह्मणों की टोलियां आने लगीं । भगवान शंकर को जब यह मालूम हुआ तो वे कौतुहलवश एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धर कर ब्राह्मणों की टोली में शामिल होकर वहां पहुंच गए और श्रीरामजी से बोले ‘मुझे भी भोजन करना है।’

महाप्रभु जगन्नाथ के दरबार में पुरी के राजा स्वयं अपने हाथों से लगाते हैं झाड़ू, सोने की झाड़ू से होती है सफाई

अन्तर्यामी भगवान श्रीराम बूढ़े ब्राह्मण को पहचान गए और समझ गए कि भगवान शंकर ही मेरी परीक्षा लेने यहां पधारे हैं। ब्राह्मण भोजन के लिए जैसे ही पंगत पड़ी, भगवान श्रीराम ने स्वयं उस वृद्ध ब्राह्मण के चरणों को अपने करकमलों से धोया और आसन पर बिठाकर भोजन-सामग्री परोसना शुरु कर दिया। छोटे भाई लक्ष्मणजी भगवान शंकर को जो भी वस्तु परोसते, शंकरजी उसे एक ही ग्रास में खत्म कर देते। उनकी पत्तल पर कोई सामान बचता ही नहीं था। सभी परोसने वाले उस बूढ़े ब्राह्मण की पत्तल में सामग्री भरने में लग गए, पर पत्तल तो खाली-की-खाली ही नजर आती। श्रीरामजी मन-ही-मन मुस्कराते हुए शंकरजी की यह लीला देख रहे थे।

ठाकुर जी की अद्भुत घड़ी, जो सेल से नहीं उनके हाथों में ही चलती है

भोजन समाप्त होते देख महल में चिंता होने लगी गयी। माता सीता के पास भी यह समाचार पहुंचा कि श्राद्ध में एक ऐसे वृद्ध ब्राह्मण पधारे हैं, जिनकी पत्तल पर सामग्री परोसते ही साफ हो जाती है। श्राद्ध में आमन्त्रित सभी ब्राह्मणों को भोजन कराना भगवान श्रीराम की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया। माता सीता भी चिन्तित होने लगीं। जब बनाया गया सारा भोजन समाप्त हो गया फिर भी शंकरजी तृप्त नहीं हुए तो श्रीराम ने माता अन्नपूर्णा का स्मरण कर उनका आह्वान किया। सभी परोसने वाले व्यक्ति वहां से हटा दिये गये। माता अन्नपूर्णा वहां प्रकट हो गयीं।

जानें, हर पूजा में क्यों चढाया जाता हैं नारियल?

श्रीरामजी ने माता अन्नपूर्णा से कहा – अपने स्वामी को आप ही भोजन कराइए, इन्हें आपके अतिरिक्त और कोई तृप्त नहीं कर सकता है। मां अन्नपूर्णा ने जब अपने हाथ में भोजन पात्र लिया तो उसमें भोजन अक्षय हो गया। अब वे स्वयं विश्वनाथ को भोजन कराने लगीं। मां अन्नपूर्णा ने पत्तल में एक लड्डू परोसा। भगवान विश्वनाथ खाते-खाते थक गये पर वह समाप्त ही नहीं होता था। मां ने दोबारा परोसना चाहा तो भगवान शंकर ने मना कर दिया। शंकरजी हंसते हुए डकार लेने लगे और बोले—‘तुम्हें आना पड़ा, अब तो मैं तृप्त हो गया।’