वैश्विक तेल कीमतों में उछाल, बढ़ते ईंधन आयात बिल और गिरते रुपये के बीच भारत एक बड़े ऊर्जा संकट का सामना कर रहा है। ऐसे समय में मोनाको की एक फ़्यूल टेक्नोलॉजी कंपनी ने दावा किया है कि भविष्य का सबसे बड़ा ईंधन समाधान कहीं दूर नहीं, बल्कि पानी में छिपा हो सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली भारत की सरकार ने साल 2021 में पूरी दुनिया को तब चौंका दिया था जब हमारे प्रधानमंत्री ने देश को साल 2070 तक नेट जीरो राष्ट्र (net zero nation) बनाने की योजना का ऐलान कर दिया था।
न्यायसंगत एनर्जी ट्रांज़िशन (energy transition) पर एक बार फिर ध्यान खींचने के इरादे से इंटरनेशनल फोरम फॉर एनवायरनमेंट, सस्टेनेबिलिटी, एंड टेक्नालजी (iForest) ने दिल्ली में इस विषय के तमाम नीतिगत और वित्तीय पहलुओं पर बात करने के लिए पहला ग्लोबल जस्ट ट्रांज़िशन डायलॉग आयोजित किया।
ऊर्जा क्षेत्र की देश की अग्रिणी सार्वजनिक गैर बैंकिंग वित्तीय कम्पनियां (NBFC) पीएफसी और आरईसी नई प्रौद्योगिकियों (पवन बिजली सौर ऊर्जा बैटरी स्टोरेज और इलेक्ट्रिक वाहन आदि) के हिसाब से खुद को पर्याप्त रूप से बदल नहीं पाई हैं जिसके चलते इनके विकास और मुनाफ़ा कमाने की दर ठहरी हुई है।
इस साल के अंत तक भारत ने अपने लिए 175 गीगावाट की रिन्यूबल एनेर्जी क्षमता स्थापना का लक्ष्य रखा था। मगर बीती अगस्त तक भारत ने इस लक्ष्य का दो तिहाई हासिल किया है। मतलब दिसंबर तक लक्ष्य का एक तिहाई हासिल करना बाकी है।
उड़ीसा का एक ज़िला है अंगुल। यह ज़िला देश के 12% कोयला उत्पादन के लिए जिम्मेदार है और यहाँ उड़ीसा के कुल कोयला उत्पादन का 56 प्रतिशत कोयला उत्पादित होता है।
एनर्जी ट्रांज़िशन (energy transition) में तेजी लाने और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से मुकाबला करने के लिए पिछले हफ्ते जी20 देशों के नेताओं ने वर्ष 2030 तक वैश्विक रिन्युब्ल एनेर्जी (renewable energy) उत्पादन क्षमता को तीन गुना करने का संकल्प किया है।
विश्व एनर्जी ट्रांज़िशन आउटलुक को पूर्वावलोकन इस दिशा में प्रगति की नाटकीय कमी की चेतावनी देता है, साथ ही करता है 1.5 डिग्री सेल्सियस जलवायु लक्ष्य को बनाए रखने के लिए एनर्जी ट्रांज़िशन में सामरिक बदलाव की मांग
जी20 देशों के अध्यक्ष के रूप में भारत के पास वैश्विक स्तर पर न्यायसंगत ट्रांज़िशन (equitable transition) के वित्तपोषण तथा कई अन्य पहलुओं पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का मौका है।
कुछ ही दिनों में दुनिया के नीति निर्माता ईजिप्ट के शर्म अल शेख में संयुक्त राष्ट्र के अगले जलवायु सम्मेलन, सीओपी 27, में मिल कर पूरी पृथ्वी पर जलवायु कार्यवाही के लिए कुछ अहम फैसले लेंगे। और ठीक उससे पहले पिछले कुछ समय से G7 और उसके सहयोगियों ने वियतनाम, इंडोनेशिया और भारत को कोयले से दूर होने के लिए अरबों डॉलर की पेशकश की है। लेकिन अभी तक इस दिशा में खास बढ़त नहीं देखी गयी।
केंद्र और राज्य सरकारें सही दिशा में काम करें तो वर्ष 2026 तक वायु ऊर्जा देश की कुल स्वच्छ ऊर्जा क्षमता में कर सकती है 23.7 गीगावॉट वृद्धि में मदद
यूरोप के तमाम विकसित देश अक्सर भारत जैसे विकासशील देशों पर अधिक कार्बन एमिशन (carbon emission) का आरोप लगाते हैं और उम्मीद करते हैं कि वो अपना एमिशन सतत गति से कम करें और एनेर्जी ट्रांज़िशन (energy transition) की सोचें, लेकिन आज हालात ऐसे बन गए हैं कि यूरोप ख़ुद एक ऊर्जा संकट (energy crisis) की मझधार में फंसा दिख रहा है।





