उत्तराखंड (Uttarakhand) में गढ़वाल मंडल (Gharwal) के चमोली जिले में सोनप्रयाग से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर मुंडकटिया मंदिर है। यह विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहाँ बिना सिर के भगवान गणेश जी की पूजा की जाती है।
माता आदिशक्ति के 51 पीठों की तरह ही कोल्हापुर में 27 हजार वर्गफुट में फैला माता महालक्ष्मी (Mahalakshmi) का शक्तिपीठ विश्व प्रसिद्ध है। 2000 साल पुराने इस मंदिर को सबसे प्राचीन माना जाता है।
राजस्थान (Rajasthan) में झालरापाटन (Jhalrapatan) का सूर्य मंदिर (Surya Mandir) अपनी प्राचीनता और स्थापत्य वैभव के कारण कोणार्क के सूर्य मंदिर और ग्वालियर (Gwalior) के 'विवस्वान मंदिर' (Vivaswan Temple) का स्मरण कराता है।
भारत में एक जगह ऐसी है जहां हनुमान जी (Hanuman ji) की पूजा नहीं की जाती है। यह जगह है उत्तराखंड स्थित द्रोणागिरि गांव। यहां के लोगों का मानना है कि हनुमान जी जिस पर्वत को संजीवनी बूटी के लिए उठाकर ले गए थे, वह यहीं स्थित था। चूंकि द्रोणागिरि के लोग उस पर्वत की पूजा करते थे, इसलिए वे हनुमानजी द्वारा पर्वत उठा ले जाने से नाराज हो गए। यही कारण है कि आज भी यहां हनुमान जी की पूजा नहीं होती।
छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) में भगवान विष्णु (Lord Vishnu) का एक अनोखा मंदिर है जो अपने निर्माण काल से अधूरा है और कभी पूरा नहीं किया जा सका। इस मंदिर को जांजगीर विष्णु मंदिर (Janjgir Vishnu Temple) के नाम से जाना जाता है।
जब भगवान श्री कृष्ण ने जन्म लिया तो सभी देवी-देवता उनके दर्शन करने नंदगांव पधारे। कृष्णभक्त शनिदेव भी देवताओं संग श्रीकृष्ण के दर्शन करने नंदगांव पहुंचे। परंतु मां यशोदा ने उन्हें नंदलाल के दर्शन करने से मना कर दिया। मां यशोदा को डर था कि शनिदेव कि वक्र दृष्टि कहीं कान्हा पर न पड़ जाए। शनिदेव को यह अच्छा नहीं लगा और वो निराश होकर नंदगांव के पास जंगल में आकर तपस्या करने लगे। शनिदेव का मानना था कि पूर्णपरमेश्वर श्रीकृष्ण ने ही तो उन्हें न्यायाधीश बनाकर पापियों को दण्डित करने का कार्य सौंपा है।
जब भगवान श्री कृष्ण (Lord Krishna) अपने बाल्यावस्था में थे। उस समय ब्रह्मा जी को पता चला कि भगवान विष्णु स्वयं श्री कृष्ण के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं, तो उनके मन में श्री कृष्ण के दर्शन करने का विचार आया। वह ब्रह्मलोक से पृथ्वी पर आए और देखा कि अपने सिर पर मोर मुकुट को धारण किए एक बालक गायों और ग्वालों के साथ मिट्टी में खेल रहा है।
भगवान गणेश (Lord Ganesha) के शीश कटने को लेकर पुराणों में कई कथाएं प्रचलित हैं। इन्हीं में से एक कथा है कि शनिदेव (Shanidev) के कारण ही भगवान गणपति का शीश कटा था। ब्रह्मवैवर्तपुराण में इस कथा का वर्णन है।
उत्तराखंड (Uttarakhand) पिथौरागढ़ (Pithoragarh) जिला से करीब 90 किलोमीटर दूर गंगोलीहाट के भुवनेश्वर गांव में पाताल भुवनेश्वर गुफा (Patal Bhubaneswar Cave) स्थित है। यह गुफा समुद्र तल से 1350 किलोमीटर की ऊंचाई पर है। यह गुफा किसी आश्चर्य से कम नहीं है। यह प्रवेश द्वार से 160 मीटर लंबी और 90 फीट गहरी है।
उज्जैन (Ujjain) से करीब 6 किलोमीटर दूर श्री चिंताहरण गणेश मंदिर (Shri Chintaharan Ganesh Temple) में भगवान श्री गणेश के तीन रूप एक साथ विराजमान है। जो चितांमण गणेश, इच्छामण गणेश और सिद्धिविनायक के रूप में जाने जाते है।
राजस्थान के बाराँ जिले की अंता तहसील में स्थित सोरसन गाँव में ब्रह्माणी माता का मंदिर विश्व का एकमात्र मंदिर है, जहाँ पर देवी की पीठ की पूजा-अर्चना होती है। कहा जाता है कि ब्रह्माणी माता का प्राकट्य यहाँ पर 700 वर्ष पूर्व हुआ था। तब यह देवी खोखर गौड़ ब्राह्मण पर प्रसन्न हुई थी, इसलिए आज भी खोखरजी के वंशज ही मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं।
कटारमल सूर्य मंदिर (Katarmal Surya Mandir) देश का प्राचीनतम सूर्य मंदिर है। यह पूर्वाभिमुखी है तथा उत्तराखण्ड (Uttarakhand) राज्य में अल्मोड़ा (Almora) जिले के अधेली सुनार नामक गॉंव में स्थित है। इसकी विशेषता है कि यहां पर सूर्य देव की मूर्ति किसी धातु या पत्थर से निर्मित नहीं, बल्कि एक बड़ के पेड़ की लकड़ी से बनी है। यह अपने आप में अद्भुत व अनोखी है। इस सूर्य मंदिर को “बड़ आदित्य मंदिर” (Aditya Mandir) भी कहा जाता है।

