प्रभु राम के सबसे बड़े भक्त माने जाने वाले कलयुग के जीवित देवता हनुमान जी (Hanuman ji) तब अधिक प्रसन्न होते हैं जब उनके भक्त राम नाम का जाप करते हैं। मान्यता है कि जहां कहीं भी राम कथा चलती है वहां हनुमान जी किसी न किसी रूप में उपस्थित होते ही हैं। माता सीता से हनुमान जी को अजर-अमर रहने का वरदान प्राप्त है।
विश्व का सबसे बड़ा यह मंदिर कंबोडिया (Cambodia) में है। इसे अंकोरवाट (Angkor Wat) के नाम जाना जाता है। यह मंदिर अंकोरयोम नामक नगर में स्थित है, जिसे प्राचीन काल में यशोधरपुर कहा जाता था। यह विशाल भव्य मंदिर भगवान विष्णु (Lord Vishnu) को समर्पित है
पूर्वजों की परंपरा, गोत्र, संस्कार, धन-संपदा से जीवन आगे बढ़ता है। उन्हीं पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है पितृपक्ष। भाद्रपद शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि से आश्विन कृष्णपक्ष की अमावस्या तिथि तक पितृपक्ष माना जाता है।
सृष्टि के आरंभ में जब देवी सरस्वती प्रकट हुई तब देवी ने अपनी वीणा के स्वर से सृष्टि में ध्वनि को जन्म दिया। लेकिन इस ध्वनि में न तो सुर था और न ही संगीत। सृष्टि के आरंभ से आनंदित शिव जी ने जैसे ही नृत्य आरंभ किया और 14 बार डमरू बजाया तभी उनके डमरू की ध्वनि से व्याकरण और संगीत के धन्द, ताल का जन्म हुआ।
भारत के साथ ही विश्व के कई देशों में प्रसिद्ध हिंदू मंदिर हैं। इसी तरह नेपाल में भी कई प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहां हजारों हिंदू दर्शन के लिए जाते रहते हैं। इन्हीं मंदिरों में एक बेहद रहस्यमयी मंदिर है। इस मंदिर में कोई भी आम नागरिक तो पूजा कर सकता है, लेकिन नेपाल राजपरिवार के लोग इस मंदिर में पूजा नहीं कर सकते हैं। जानिए, इस मंदिर के बारे में।
शनिदेव (Shanidev) का एक चमत्कारी मंदिर उत्तरकाशी जिले के खरसाली गांव में स्थित है। यह प्राचीन मंदिर समुद्र तल से लगभग 7000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर अपनी अनूठी डिजाइन और सुंदर कलाकृतियों के लिए पूरे देश भर में प्रसिद्ध है।
दस देशों में स्थापित गणेशी प्रतिमाओं की प्रतिकृति को यहां दर्शाया गया
वैसे तो राधा जी (Radha Rani) के जन्म के बारे में अनेक कथाएं शास्त्रों में आती हैं, लेकिन ऐसा माना जाता है कि आज से करीब पांच हजार दो सौ वर्ष पूर्व मथुरा जिले के गोकुल-महावन कस्बे के निकट रावल गांव में भाद्र पद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि, अनुराधा नक्षत्र, मध्यान्ह काल 12 बजे और सोमवार के दिन पिता वृषभानु और माता कीर्तिदा की पुत्री के रूप में श्री राधिका जी ने जन्म लिया था।
सनातन संस्कृति के अनुसार कलयुग के एक मात्र दिखने वाले देवता सूर्य देव (Surya Dev) ही हैं। सूर्य देव को आरोग्य का कारक भी माना जाता है। सूर्य ब्रह्मण्ड की केंद्रीय शक्ति हैं। यह सम्पूर्ण सृष्टि का गतिदाता हैं।
राम भक्त हनुमानजी (Hanumanji) की पूंछ में चमत्कारिक असर माना गया है। यही कारण है कि ग्रहों के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए भी उनकी पूंछ की पूजा की जाती है। हनुमान जी को देवी-देवताओं ने कई तरह की शक्तियों का वरदान दिया है। अष्टसिद्धि और नवनिधि के दाता की पूंछ में भी कम ताकत नहीं होती।
उत्तराखंड (Uttarakhand) के पिथौरागढ़ (Pithoragarh) जिले में मां चंडिका देवी (Mother Chandika Devi) का मंदिर स्थित है। चंडिका देवी को मां दुर्गा (Maa Durga) का ही रूप माना जाता है। मार्कण्डेय पुराण के दुर्गा माहात्म्य में इनके कृत्यों एवं स्वरूप का वर्णन किया गया है। मां चंडिका को न्याय की देवी भी कहा जाता है।
पिंडदान की शुरुआत कब और किसने की, यह बताना उतना ही कठिन है जितना कि भारतीय धर्म-संस्कृति के उद्भव की कोई तिथि निश्चित करना। परंतु स्थानीय पंडों का कहना है कि सर्व प्रथम सतयुग में ब्रह्माजी ने पिंडदान किया था। महाभारत के 'वन पर्व' में भीष्म पितामह और पांडवों की गया यात्रा का उल्लेख मिलता है। श्रीराम ने महाराजा दशरथ का पिण्डदान गया में किया था।
